नई दिल्ली. मौजूदा समय में भारत में गाय की पचास किस्में है, जिसमें से गुजरात में ‘गीर’, ‘कांकरेज’, और डांगी के बाद अब ‘डगरी’ भी शामिल हो गई. गुजरात राज्य पशुधन और जैव विविधता के लिए जाना जाता है. अभी तक भारत की पशुओं की कुल 175 नस्लों में से 24 नस्लें गुजरात ने दी हैं. गुजरात की गीर गाय को दूध उत्पादन के लिये गुजरात और भारत में ही नही बल्कि विश्व में प्रसिद्ध मिली है. जहां कि कांकरेज गाय दूध के लिये वही बैल खेती के कार्यों में अधिक भारवहन करने की क्षमता के लिये प्रसिद्ध है. वहीं डगरी गाय की पहचान की शुरूआत वर्ष 2015 में डॉ. के. बी. कथीरीया द्वारा हुई थी. जब वो 2011-2016 तक अनुसंधान निदेशक के पद पर थे.
तब मध्य गुजरात के अलग अलग जिलों के विविध संशोधन केन्द्रों खासकर गोधरा, दाहोद, छोटा उदयपुर और उसके विस्तार में भ्रमण के लिये जाते थे. इन क्षेत्रों के भ्रमण के दौरान किसानों द्वारा पाली जाने वाली गायों और बैलों तथा रास्ते में चरती हुई गायों के झुंड को ध्यान से देखते थे और उन्होनें गौर किया कि कुछ गायों और बैलों की संताने उनकी दूसरी संतानों से अलग हैं. इस बात को ध्यान में रखते हुये वर्ष 2016-17 में इस गाय के बाहरी और अनुवांशिक लक्षणों के आधार पर गाय की खोज डॉ. डीएन रांक, डॉ. आरएस. जोशी, डॉ. एसी. पटेल पशु अनुवांशिकी एवं प्रजनन विभाग, वेटरनरी महाविद्यालय के मार्गदर्शन में शुरू किया गया.
डगरी गाय का क्षेत्र तथा उनकी संख्या
वर्ष 2016-17 के दौरान उन क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया जहां डगरी गाय पाई जाती हैं. सर्वेक्षण के दौरान इन गायों की संख्या मुख्य रूप से दाहोद, छोटा उदयपुर और कुछ हद तक पंचमहल, महीसागर और नर्मदा जिलों में पायी गयी. इन जिलों में भारत सरकार द्वारा कराई गई 16वीं पशुधन संगणना के अनुसार पशुओं की संख्या लगभग 2,82,403 जितनी थी. इस पूरे क्षेत्र में आदिवासी बाहुल्य जिलें हैं. इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थिति देखें तो अधिकांश क्षेत्र पहाड़ी हं. जहां बारिश के मौसम में अच्छी बरसात होती है. हालांकि गर्मी के मौसम में पहाड़ी और चट्टानी इलाकों के कारण कुंआ/नहरों के माध्यम से सिंचाई की सुविधा बहुत कम है. मवेशी सूखे चारों पर निर्भर करते हैं और विशेष रूप से बारिश के मौसम को छोड़ कर चराई पर निर्भर हैं.
गाय की बाहरी विषेषताओं का निस्त्रपण
गाय की नई नस्ल की पहचान के लिये निर्धारित मानदंडो का उपयोग करते हुये लगभग 200 से अधिक गायों की शारीरिक विशेषताओं जैसे रंग, माथे की लम्बाई और चौड़ाई, सींग की लम्बाई और गोलाई, शरीर की लम्बाई और ऊंचाई, पूंछ की लम्बाई आदि विशेषताओं का अध्ययन किया गया था. इन लक्षणों के अध्ययन के दौरान यह पाया गया कि ‘डगरी’ गाय की इस नई नस्ल का रंग या तो पूर्ण रूप से सफेद होता है अथवा सफेद रंग के साथ आगे और पीछे के पैरों पर भूरे रंग के धब्बे होते हैं. जबकि कुछ गायों में सफेद रंग के साथ लालिमा दिखने को मिलती हैं. इस गाय के सींग पतले, ऊपर की ओर घुमावदार और सीरा नुकीला होता है. इस गाय के कान सीधे और खुले होते है.
कितना होता है वजन
छोटी कद, पतले और छोटे पैर इस गाय की मुख्य विशेषता होती है. यह गाय काफी चंचल और शरारती होती हैं. आमतौर पर गाय का वजन 150 किलो ग्राम होता है और दुधारू गाय 300-400 किलोग्राम जितना दूध देती है. इस क्षेत्र में गायों का महत्व दूध देने के अलावा उनके बछडो को बैलों के रूप में खेती के उपयोग में लाने का भी है. क्योंकि इन बैलों का उपयोग पहाड़ी क्षेत्रों के साथ साथ उच्च और ढलान वाली भूमि में खेती के लिये किया जाता है. आदिवासी जनजाती वाले इन इलाकों में अधिकतर खेती बैलों की सहायता से ही की जाती है. इस नस्ल के बैल छोटे कद और कम वजनी होने के कारण इस क्षेत्र में खेती के लिये काफी उत्तम साबित होते हैं. इतना ही नही हरे और सूखे चारों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुये यह नस्ल अधिक उपयुक्त है क्योंकि नस्ल को कम चारे की आवश्यकता होती है.
खुराक और पालन-पोषण
आमतौर पर रात के समय इस नस्ल के पशुओं को घर से लगी छत, कच्ची मिट्टी की दीवारों से बने फूस की झोपड़ियों या खुले स्थानों पर रखा जाता है. इन पशुओं को बारिश के दौरान सुबह से शाम तक खुले चारागाहों में चराया जाता है. ताकि उन्हें हरा चारा मिल सके. रात के समय आमतौर पर सूखा चारा दिया जाता है और अगर जरूरत पड़े तो हरा चारा भी दिया जाता है. बारिश के बाद पहाड़ी इलाकों में उगी हुई घास को काटकर पूरे साल के लिये संग्रहित किया जाता है. सर्दी और गर्मी के मौसम में सुबह अथवा पूरे दिन पशुओं को चराते रहते हैं. इसके अलावा किसान खेत में बीए मक्का, ज्वार बाजरा की कटाई के बाद सूखे पौधों को चारे के रूप में दिया जाता है.