नई दिल्ली. पशुओं को हर हाल में बीमारियों से बचाना जरूरी है. क्योंकि एक बार बीमारी लग गई तो फिर इससे नुकसान ही नुकसान होता है. पशुओं में खुर पकने की बीमारी जिससे फुट रोट भी कहा जाता है, बेहद गंभीर बीमारी है. जिससे पशुओं को बहुत ज्यादा शारीरिक तकलीफ उठाना पड़ जाता है. वहीं इस बीमारी के चलते पशु का उत्पादन बहुत ज्यादा प्रभावित होता है. इसके अलावा पशुपालकों को भी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ जाता है. फुट रोट बरसात या कीचड़ में रहने के कारण होती है. इसके अलावा अन्य कारण भी हैं.
एनिमल एक्सपर्ट कहते हैं कि ये बीमारी बैक्टीरियल संक्रमण के चलते होती है. जिससे पशु के खुर गलने लगते हैं और उसमें सूजन आती है. बाड़े में रहने या पोषण की कमी से भी खुर समान्य रूप से बढ़ जाते हैं. जिससे भी चलने में दिक्कत आती है. पशुपालन में पशुओं के खुर की देखभाल किस तरह से की जाए, इसको लेकर भारत और डेनमार्क के बीच एक अहम कदम उठाया गया है. जिससे भारत में पशुपालकों को फायदा होगा.
पशुओं के खुरों को मजबूत बनाने की पहल
एक्सपर्ट कहते हैं कि पशुओं के खुरों को मजबूत बनाना जरूरी है. तभी भारतीय डेयरी उद्योग को मजबूत किया जा सकता है.
जिसको देखते हुए भारत और डेनमार्क के सहयोग में एक और कदम उठाया गया है, जिससे पशु के खुरों की हिफाजत होगी.
NDDB ने डेनिश वेटेरिनरी एंड फ़ूड एडमिनिस्ट्रेशन (डेनमार्क) और केरल वेटेरिनरी एंड एनिमल साइंसेज यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर ‘हूफ एकेडमी’ शुरू की है.
यह वैज्ञानिक तरीके से खुरों की देखभाल (साइंटिफिक हूफ मैनेजमेंट) के लिए भारत का पहला रेजिडेंशियल और प्रैक्टिकल ‘ट्रेनर-ऑफ-ट्रेनर्स’ प्रोग्राम है.
इसका पहला बैच केरल वेटेरिनरी एंड एनिमल साइंसेज यूनिवर्सिटी, त्रिशूर में शुरू हुआ.
जिसमें पूरे भारत से आए वेटेरिनरी अधिकारियों को अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की देखरेख में ‘व्हाइट लाइन एटलस मेथड’ (WLAM) की ट्रेनिंग दी गई.
चूंकि लंगड़ापन डेयरी पशुओं के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए एक बड़ी चुनौती है. इसलिए इससे पार पाने के लिए हर संभव कोशिश हो रही है.
बताया गया कि इस प्रोग्राम का मकसद खुरों की देखभाल करने वाले कुशल ट्रेनर्स का नेटवर्क बनाना है.
जिससे भारत के डेयरी क्षेत्रों में पशु कल्याण, उत्पादकता और ज़िम्मेदार डेयरी खेती को बढ़ावा दिया जा सके.
निष्कर्ष
एक्सपर्ट का कहना है कि खुर की समस्या से पशुओं का उत्पादन तो प्रभावित होता ही है, साथ ही पशुपालकों को भी नुकसान होता है. उत्पादन कम होने से जहां उनकी रोज की इनकम प्रभावित होती है. वहीं इलाज कराने से पशुपालन की लागत बढ़ जाती है. हालांकि जब ट्रेनर्स का नेटवर्क तैयार होगा तो फिर इस तरह की समस्या से निजात मिल जाएगी.













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