नई दिल्ली. गुरु अंगद देव वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेज यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर फॉर वन हेल्थ’ के डायरेक्टर डॉ. जसबीर सिंह बेदी ने “भारत में बायोसेफ्टी और बायोसिक्योरिटी प्रयोगशालाओं पर दूसरी टेक्निकल वर्किंग ग्रुप मीटिंग” में हिस्सा लिया. यह चार दिन का कार्यक्रम AIIMS, नई दिल्ली में आयोजित किया गया था. वाइस-चांसलर डॉ. जेपीएस गिल ने इस प्रतिष्ठित बैठक में यूनिवर्सिटी का प्रतिनिधित्व करने के लिए ‘सेंटर फॉर वन हेल्थ’ के वैज्ञानिकों को बधाई दी. यह कार्यक्रम “बायोसेफ्टी, बायोसिक्योरिटी और विशेष पैथोजन रिसर्च की तैयारी पर राष्ट्रीय रणनीतिक संवाद” का मुख्य हिस्सा था.
इस संवाद में प्रमुख संस्थानों के जाने-माने वैज्ञानिक और विषय विशेषज्ञ शामिल हुए, जिनमें इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल, डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन/डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (DRDO/DRDE), AIIMS नई दिल्ली, डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी, डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी और अन्य प्रमुख संगठन शामिल थे.
जोखिम कम करने वाले उपायों के महत्व पर दिया जोर
डॉ. बेदी ने बताया कि देश भर से चुने गए 25 वैज्ञानिकों के समूह के सामने “ज़ूनोसिस (जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों) की रोकथाम पर बात की.
साथ ही इसकी निगरानी और जोखिम कम करने के लिए समुदाय-आधारित ‘वन हेल्थ’ रणनीतियाँ” विषय पर एक विशेषज्ञ व्याख्यान भी दिया.
डॉ. बेदी ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करने के लिए समुदाय-केंद्रित निगरानी, कई क्षेत्रों के बीच तालमेल, ज़ूनोटिक खतरों का जल्द पता लगाने और स्थानीय स्तर पर जोखिम कम करने वाले उपायों के महत्व पर जोर दिया.
इसी सेंटर के डॉ. पंकज ढाका को भी टेक्निकल वर्किंग ग्रुप (TWG) के लिए नामित किया गया, जिससे राष्ट्रीय बायोसेफ्टी और बायोसिक्योरिटी गाइडेंस के विकास में यूनिवर्सिटी का योगदान और मजबूत हुआ.
AIIMS, नई दिल्ली के डॉ. विक्रम सैनी और USA के जॉर्जिया के रोज़वेल स्थित SOTER की अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ नताशा के. ग्रिफिथ द्वारा समन्वित इस कार्यक्रम में प्रयोगशाला SOPs और हाई-कंटेनमेंट सुविधा के संचालन पर ध्यान केंद्रित किया गया.
इसमें भागीदारी ‘वन हेल्थ’, ज़ूनोसिस की रोकथाम और बायोसेफ्टी की तैयारी के क्षेत्र में यूनिवर्सिटी की बढ़ती राष्ट्रीय नेतृत्व भूमिका को दर्शाती है.
यूनिवर्सिटी के अलग-अलग विभागों ने पशुपालक किसानों के साथ अपनी जानकारी और ज्ञान साझा किया. पशु पोषण विभाग ने जानवरों को खिलाने के लिए बाईपास फैट और मिनरल मिक्सचर जैसी कई नई तकनीकें विकसित की हैं.
पशुपालक किसानों को पशुओं का चारा तैयार करने के लिए सही मात्रा के बारे में भी जानकारी दी गई। किसानों को कृत्रिम गर्भाधान (artificial insemination) के फायदों के बारे में भी बताया गया.
यूनिवर्सिटी के पशु चिकित्सा अस्पताल के विशेषज्ञों ने, जो जानवरों की स्वास्थ्य समस्याओं के लिए काम करते हैं, किसानों को बताया कि वे किसी भी तरह की क्लिनिकल सेवा प्राप्त कर सकते हैं.












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