नई दिल्ली. पोल्ट्री फार्मिंग में मुर्गे-मुर्गियों को बीमारी से बचाना जरूरी होता है. क्योंकि उनके बीमार होने से पोल्ट्री फार्मिंग में बड़ा आर्थिक नुकसान हो जाता है. इसलिए बीमारियों से बचाव के उपाय जरूर करें. मान लीजिए कि आप ये नहीं कर पा रहे हैं और मुर्गे-मुर्गियां बीमार हो गए हैं तो आप शुरुआती लक्षणों को पहचान कर इलाज करेंगे तो नुकसान से खुद को बचा लेंगे. पोल्ट्री एक्सपर्ट कहते हैं कि मुर्गे-मुर्गियों के बीट से आप उनकी बीमारी की पहचान कर सकते हैं. क्योंकि बीट का कलर कौन सी बीमारी है, इस ओर इशारा करता है.
इस रिपोर्ट में लाइव स्टॉक एनिमल न्यूज आपको मुर्गे-मुर्गियों के बीट को देखकर बीमारी की पहचान कैसे करना है उसके बारे में जानकारी दे रहा है. यानि बीट (मल) के अलग-अलग रंगों के आधार पर बीमारियों की पहचान और रोकथाम के तरीके बताए गए हैं. आइए जानते हैं.
बीट के रंग और बीमारियों के संकेत
लाल या खूनी बीट कॉक्सिडियोसिस (Coccidiosis) बीमारी का संकेत है.
गीला बिछावन, अमोनिया गैस और फार्म में गंदगी इसका कारण है.
बिछावन को हमेशा सूखा रखें, धान की भूसी या लकड़ी के बुरादे की रोज रैकिंग यानि (उलट-पलट) करें.
पशु चिकित्सक की सलाह लें और डॉक्टर अगर दवा के बारे में बताए तो मुर्गे-मुर्गियों को तुरंत दें.
हरी बीट रानीखेत (Ranikhet) बीमारी का संकेत है. या फिर मुर्गियों द्वारा 24 घंटे से दाना न खाने पर पित्त बाहर निकलना भी इसका संकेत है.
समय पर रानीखेत का टीकाकरण (वैक्सीनेशन) कराएं और बायोसिक्योरिटी के नियमों का पालन करें.
सफेद या चूने जैसी पतली बीट गंबोरो (IBD) या प्युलोरम का संकेत है. सफेद डायरिया ज्यादातर चूजों में होता है.
रोकथाम के लिए 12 से 14 दिन पर आईबीडी का पहला टीका और 28वें दिन दूसरा टीका लगवाएं.
झागदार पीली या बहुत पतली पानी जैसी बीट भी बीमारी का संकेत है.
असल में फंगस लगा हुआ या खराब दाना खाने से पीली झागदार बीट होती है, और गर्मियों में ज्यादा पानी पीने पर पतली पानी जैसी बीट आ सकती है.
निष्कर्ष
इसलिए फार्म में रोज घुसते ही बिछावन की जांच करें ताकि बीट के रंग से बीमारी का तुरंत पता चल सके. बिछावन को कभी गीला न रहने दें, क्योंकि 80% बीमारियां गीले बिछावन से होती हैं. पाचन तंत्र को मजबूत रखने के लिए डॉक्टर की सलाह से समय-समय पर अच्छा लिवर टॉनिक दें. ऐसा करने से मुर्गियों को बीमारी से बचा पाएंगे.












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