नई दिल्ली. पशुओं को कई बीमारियों का खतरा रहता है. वहीं पशुओं को हर बीमारी से बचाना भी जरूरी है. क्योंकि बीमारी की वजह से उत्पादन पर असर तो पड़ता ही है. साथ ही पशुपालन की लागत भी बढ़ जाती है. एनिमल एक्सपर्ट का कहना है कि पशुओं में मेटाबोलिक बीमारियां (चयापचय रोग) भी बेहद ही खतरनाक माना जाता है. ये बीमारी वायरस, बैक्टीरिया या संक्रमण के कारण नहीं होती हैं, बल्कि शरीर के अंदर पोषक तत्वों (जैसे ऊर्जा, कैल्शियम, मैग्नीशियम) का संतुलन बिगड़ने से पैदा होती है. इस बीमारी में भी पशुपालन में नुकसान होता है.
ये समस्याएं आमतौर पर पशुओं के ब्याने के आसपास या अधिक दूध देने के समय (ट्रांजिशन पीरियड) में होती हैं. एक्सपर्ट कहते हैं कि इसमें हाने वाले लोग पशु के शरीर में पोषक तत्वों की कमी, हार्मोन में असंतुलन या चयापचय (Metabolism) के गड़बड़ाने से भी होते हैं. अगर आपके पशु के साथ भी ऐसा हो रहा है तो उन्हें मेटाबॉलिक बीमारी मान लें.
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मुख्य मेटाबॉलिक रोग की बात की जाए तो इसमें दूध ज्वर (Milk Fever) भी आता है.
वहीं कीटोसिस (Ketosis) और एसिडोसिस (Acidosis) बीमारी भी इसी में आती है.
पशुओं को अगर हाइपोकैल्सीमिया (कैल्शियम की कमी) हाइपोफॉस्फ टेमिया (फॉस्फोरस की कमी) है तो भी मेटाबॉलिक है.
वहीं हाइपोमैग्नीसीमिया (मैग्नीशियम की कमी) से काँपर की कमी से या फिर विटामिन A, D, E की कमी से भी ऐसा होता है.
सामान्य लक्षणों की बात करें तो भूख कम लगना या बंद होना आम बात है.
पशु कमजोर नजर आने लगता है. सुस्त नजर आता है.
दूध उत्पादन में कमी देखी जाती है. वहीं पशु का पेट फूलने लगता है. या अपच की समस्या हो जाती है.
चलने में कठिनाई यानि लड़खड़ाना आम बात है.
कभी-कभी मृत्यु भी हो सकती हैं.
उपचार के तौर पर पशु को संतुलित आहार दें.
कमी वाले मिनरल या विटामिन की पूर्ति करें.
पशु को आराम दें और साफ पानी उपलब्ध कराएं.
गंभीर स्थिति में तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें.
निष्कर्ष
हर बीमारी का उपचार पशु चिकित्सक की सलाह से करें. खुद इलाज करने से और ज्यादा नुकसान हो सकता है. इसलिए डॉक्टर की सलाह जरूरी है.













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