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Poultry Feed: फंगस लगा फीड खाने से मुर्गियों में बढ़ सकती है मृत्युदर, कई और भी नुकसान हैं

पोल्ट्री फीड और पोल्ट्री बर्ड.

नई दिल्ली. मुर्गी पालन की सफलता काफी हद तक पक्षियों को दिए जाने वाले भोजन पर निर्भर करती है. भोजन पोषक तत्वों से भरपूर होने के बावजूद फंगस और उनसे जुड़े विषाक्त पदार्थों की उपस्थिति के कारण पक्षियों के लिए गंभीर रूप से हानिकारक हो सकता है. सभी माइकोटॉक्सिन विषैले पदार्थ होते हैं जो कुछ कवकों द्वारा आहार सामग्री पर वृद्धि के दौरान उत्पन्न होते हैं, लेकिन सबसे घातक एफ्लाटॉक्सिन होते हैं. क्योंकि इनका पक्षियों के स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है, जिससे उत्पादकता में कमी आती है और विश्व स्तर पर आर्थिक नुकसान होता है. ये विषाक्त पदार्थ मुख्य रूप से एस्परजिलस फ्लेवस और एस्परजिलस पैरासिटिकस नामक कवकों द्वारा उत्पन्न होते हैं.

इससे मुर्गी पालन में मुर्गियों को कई बीमारियां का खतरा रहता है. उसी में से एक एफलाटॉक्सिकोसिस. एफलाटॉक्सिकोसिस एक प्रकार की बीमारी है जो एफलाटॉक्सिन युक्त भोजन खाने से उत्पन्न होती है. एफ्लाटॉक्सिन आहार नाल में प्रवेश करता है और रक्त प्रवाह के माध्यम से यकृत तक पहुंचता है, जहां यह मुख्य रूप से इसे नुकसान पहुंचाता है. एफ्लाटॉक्सिन विभिन्न प्रकार के होते हैं. जैसे कि बी1, बी2, जी1, जी2 जिसमें बी1 सबसे अधिक विषैला होता है. इससे मुर्गियों का उत्पादन प्रभावित होता है. जिससे पोल्ट्री फार्मिंग में नुकसान होता है.

इन फीड में फंगस से होती है समस्या
आपको बता दें कि कई एफ्लाटॉक्सिन मक्का, मूंगफली खली, सोयाबीन खली, चावल की भूसी, भंडारित अनाज आदि में फंगस लगने से हो सकती है.

अनुचित तरीके से सुखाए गए, क्षतिग्रस्त अनाज, कीटों का संक्रमण और गोदाम की खराब स्थिति कवक संक्रमण को बढ़ावा देती है.

इससे मुर्गियां भोजन सेवन में कमी कर देती हैं. उनका उत्पादन गिर जाता है.

उन्हें अवसाद और सुस्ती की समस्या हो जाती है.

मुर्गियों का पंख बिखरने लग जाता है.

दस्त की समस्या भी हो जाती है.

एनीमिया हो सकती है औरमृत्यु दर में अचानक वृद्धि हो जाती है.

वहीं इस तरह के फीड को खिलाने से झुंड का असमान्य विकास होता है.

अंडे उत्पादन में कमी देखी जाती है.

इसके साथ ही रोग का प्रकोप बढ़ जाता है.

प्रजनन क्षमता और चूजों के अंडों से बच्चे निकलने की दर में कमी देखी जाती है.

प्रतिरक्षा तंत्र का कमजोर होना, जिससे टीके का असर न होना और द्वितीयक जीवाणु एवं वायरल संक्रमणों में वृद्धि होना आम है.

Written by
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