नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश में दूध उत्पादन बढ़ाने और नस्ल सुधार के लिए पशुपालन विभाग सेक्स सॉर्टेड सीमेन (Sex Sorted Semen) तकनीक को बढ़ावा दे रहा है. इस नए तरीके से 90 फीसद से अधिक केवल बछिया ही पैदा होती हैं, जिससे बेसहारा नर बछड़ों की समस्या पर रोक लगती है. सरकार की तरफ से प्रदेश के 75 जिलों में 9 जोनों के माध्यम से इसकी बिना किसी रुकावट आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है. बाबूगढ़ और लखनऊ (नंद बाबा मिशन) स्थित लैब्स के जरिए आगामी 5 वर्षों में 2 करोड़ सीमेन स्ट्रॉ उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है.
सही पशु चयन और कुशल एआई (AI) कार्यकर्ताओं के सहयोग से यह तकनीक किसानों की आय दोगुनी करने में मील का पत्थर साबित होगी. उत्तर प्रदेश पशुधन विकास परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने बताया कि 20वीं पशुगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 1.90 करोड़ गोवंश हैं, जिनमें 50 परसेंट से अधिक नॉन-डिस्क्रिप्ट यानि कम उत्पादक नस्ल के हैं. इसके चलते कम दूध उत्पादन के कारण किसान उन्हें छोड़ देते हैं, जिससे निराश्रित गोवंश की समस्या बढ़ती है. इसलिए सेक्स सॉर्टेड सीमेन (Sex-Sorted Semen) तकनीक काम की है.
लंबे समय तक सुरक्षित रहता है सीमेन
इस तकनीक से भ्रूण में लिंग का निर्धारण X और Y क्रोमोसोम से होता है. इस तकनीक में सीमेन से ‘X’ क्रोमोसोम (मादा जनक) को संरक्षित किया जाता है.
इससे तैयार सीमेन को -196°C पर लिक्विड नाइट्रोजन में लंबे समय तक संरक्षित रखा जाता है.
प्रदेश के 75 जिलों में 9 जोन के माध्यम से कृत्रिम गर्भाधान (AI) केंद्र, लिक्विड नाइट्रोजन और सीमेन स्ट्रॉ की आपूर्ति की जाती है.
2019 के टेंडर के बाद साहीवाल, गंगातीरी, हरियाणा, थारपारकर जैसी स्वदेशी नस्लों के 15.73 लाख से अधिक सेक्स सॉर्टेड सीमेन का उत्पादन हुआ.
इसके इस्तेमाल से लगभग 2.37 लाख गर्भाधान में 2.22 लाख से अधिक मादा बछिया यानि 90 फीसद से अधिक मामले में पैदा हुईं है.
हालांकि कृत्रिम गर्भाधान करने वाले कार्यकर्ता का पूर्णतः प्रशिक्षित होना जरूरी है, ताकि बांझपन की समस्या न आए.
सरकारप ने अगले 5 वर्षों में 2 करोड़ सेक्स सॉर्टेड सीमेन स्ट्रॉ उत्पादन का नया टेंडर किया गया है.
बाबूगढ़ स्थित लैब को सुदृढ़ कर वहां उत्पादन शुरू कर दिया गया है. यहां का लक्ष्य लगभग 20 लाख स्ट्रॉ का है.
नंद बाबा दुग्ध मिशन के अंतर्गत लखनऊ में एक अत्याधुनिक नई सेक्स सॉर्टेड लैब तैयार की जा रही है.
जिससे इस वर्ष के अंत तक 20 लाख अतिरिक्त स्ट्रॉ का वार्षिक उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य है.
गौरतलब है कि अब खेती में बैलों की आवश्यकता कम हो गई है. इसलिए केवल उच्च दुग्ध उत्पादक बछिया की जरूरत है.
निष्कर्ष
वहीं इस तकनीक से ऐसा हो भी रहा है. जिससे नर पशुओं का आर्थिक बोझ पशुपालकों पर नहीं पड़ रहा है. डेयरी फार्मों में उच्च गुणवत्ता वाली देसी नस्लों की बछियों से दुग्ध उत्पादन बढ़ेगा, जिससे किसानों की आय में निरंतर सुधार होगा.













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