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Green Fodder: पशुओं को हरा चारा देने के लिए करें इस चारा फसल की बुवाई, यहां पढ़ें इसका तरीका

सीता नगर के पास 515 एकड़ जमीन में यह बड़ी गौशाला बनाई जा रही है. यहां बीस हजार गायों को रखने की व्यवस्था होगी. निराश्रित गोवंश की समस्या सभी जिलों में है इसको दूर करने के प्रयास किया जा रहे हैं.
प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली. डेयरी उद्योग गांवों में नियमित आय और रोजगार का मुख्य जरिया है. चारा और पशु आहार की लागत कुल दूध उत्पादन लागत की 60-70 प्रतिशत होती है. इसलिए पशु पोषण की आवश्यकताओं की पूर्ति करने और दूध उत्पादन की लागत को कम करने में हरे चारे का विशेष महत्व है. अदलहनी चारा फसलें जैसे मक्का, ज्वार, मकचरी, जई आदि ऊर्जा एवं दलहनी चारा फसलें प्रोटीन एव खनिजों का मेन सोर्स होते हैं. हरे चारे से पशुओं में कैरोटीन की पूर्ति होती है. दूध में विटामिन ‘ए’ हरे चारे के माध्यम से ही उपलब्ध होता है. इसलिए पशुओं के लिए चारे की खेती करना चाहिए.

पशुओं को सालभर हरे चारे की जरूरत होती है. अगर हरा चारा पशुओं को न मिले तो जरूरी तत्वों की कमी हो जाती है और इसका असर दूध उत्पादन पर पड़ता है. इसलिए जरूरी है कि पशुओं को नियमित हरा चारा उपलब्ध कराया जाए. इसके लिए पशुपालक खुद ही हरा चारा उगा सकते हैं. कई तरह के चारे हैं, जिनकी बुवाई करके पशुओं को सालभर हरा चारा उपलब्ध कराया जा सकता है. आइए इसके बारे में जानते हैं.

मकचरी की खेती करें
मकचरी की खेती मक्का उगाने वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती है लेकिन मक्का के विपरीत इसे अधिक वर्षा और थोड़े जलभराव वाले स्थानों में भी आसानी से उगाया जा सकता है. उन्नत प्रजातियों की बात की जाए तो मकचरी इम्प्रूव्ड, देशी या स्थानीय किस्में हैं. खेत की तैयारी और बुवाई करने का तरीका इस तरह है. 2-3 जुताई हैरो से करके खेत को मुरमुरा करके 40-45 किलोग्राम बीज/हैक्टेयर की दर से बुवाई करनी चाहिये. वहीं बीज को 2-2.5 सेंटी मीटर गहराई पर दबाना चाहिये. गर्मियों में हरा चारा प्राप्त करने के लिये मार्च-अप्रैल तथा वर्षा ऋतु मे चारा प्राप्त करने के लिये जून-जुलाई में इसकी बुवाई करते हैं. फसल में दो कटाई भी प्राप्त की जा सकती हैं.

खाद एंव उर्वरक के बारे में पढ़ें
बुवाई से 2-3 हफ्ता पहले 100-150 क्विंटल गोबर की खाद तथा बुवाई के समय 30 किग्रा नत्रजन तथा 30 से 40 किग्रा प्रति हेक्टेअर फास्फोरस देना चाहिए. 30 किलोग्राम नत्रजन बुवाई के 30 दिन बाद तथा 30-40 किग्रा नत्रजन यदि दो कटाई लेनी हो तो पहली कटाई के बाद देना चाहिये. जरूरत के मुताबिक 12-15 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिये. दूसरी कटाई वाली फसल में वर्षा न होने पर 15-20 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिये. इसके बाद फरवरी के अन्त में बोयी गई फसल मई के अन्त में कटाई के लिये तैयार होती है. 1.5-2.0 मी. ऊँचाई होने पर तथा दाना निकलने से पूर्व ही फसल काट लेनी चाहिए। इससे लगभग 600-700 कु. प्रति हैक्टेयर तक उपज प्राप्त होती है.

Written by
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