Home डेयरी Dairy Farm: छोटी लंबाई और कम चारे में पाल सकते हैं ये गाय, जानें कितना देती है दूध और इसकी खासियतें
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Dairy Farm: छोटी लंबाई और कम चारे में पाल सकते हैं ये गाय, जानें कितना देती है दूध और इसकी खासियतें

डगरी' गाय की इस नई नस्ल का रंग या तो पूर्ण रूप से सफेद होता है अथवा सफेद रंग के साथ आगे और पीछे के पैरों पर भूरे रंग के धब्बे होते हैं.
डगरी गाय का प्रतीकात्मक फोटो।

नई दिल्ली. भारत की पशुओं की कुल 175 नस्लों में से 24 नस्लें गुजरात ने दी हैं. गुजरात की गीर गाय को दूध उत्पादन के लिए गुजरात और भारत में ही नही बल्कि विश्व में प्रसिद्ध मिली है. मौजूदा समय में भारत में गाय की पचास किस्में है. ‘डगरी’ किस्म की गाय की अलग ही पहचान है. वर्ष 2016-17 के दौरान उन क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया जहां डगरी गाय पाई जाती हैं. सर्वेक्षण के दौरान इन गायों की संख्या मुख्य रूप से दाहोद, छोटा उदयपुर और कुछ हद तक पंचमहल, महीसागर और नर्मदा जिलों में पाई गई.
इन जिलों में भारत सरकार द्वारा कराई गई 16वीं पशुधन संगणना के अनुसार पशुओं की संख्या लगभग 2,82,403 जितनी थी. इस पूरे क्षेत्र में आदिवासी बाहुल्य जिलें हैं. इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थिति देखें तो अधिकांश क्षेत्र पहाड़ी हैं. जहां बारिश के मौसम में अच्छी बरसात होती है. हालांकि गर्मी के मौसम में पहाड़ी और चट्टानी इलाकों के कारण कुंआ/नहरों के माध्यम से सिंचाई की सुविधा बहुत कम है. मवेशी सूखे चारों पर निर्भर करते हैं और विशेष रूप से बारिश के मौसम को छोड़ कर चराई पर निर्भर हैं.

गाय की खासियत: ‘डगरी’ गाय की इस नई नस्ल का रंग या तो पूर्ण रूप से सफेद होता है अथवा सफेद रंग के साथ आगे और पीछे के पैरों पर भूरे रंग के धब्बे होते हैं. जबकि कुछ गायों में सफेद रंग के साथ लालिमा दिखने को मिलती हैं. इस गाय के सींग पतले, ऊपर की ओर घुमावदार और सीरा नुकीला होता है. इस गाय के कान सीधे और खुले होते है.

छोटी लेकिन मजबूत: छोटी कद, पतले और छोटे पैर इस गाय की मुख्य विशेषता होती है. यह गाय काफी चंचल और शरारती होती हैं. आमतौर पर गाय का वजन 150 किलो ग्राम होता है और दुधारू गाय 300-400 किलोग्राम जितना दूध देती है. इस क्षेत्र में गायों का महत्व दूध देने के अलावा उनके बछडों को बैलों के रूप में खेती के उपयोग में लाने का भी है. क्योंकि इन बैलों का उपयोग पहाड़ी क्षेत्रों के साथ साथ उच्च और ढलान वाली भूमि में खेती के लिए किया जाता है. इस नस्ल के बैल छोटे कद और कम वजनी होने के कारण इस क्षेत्र में खेती के लिए काफी उत्तम साबित होते हैं. इतना ही नही हरे और सूखे चारों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुये यह नस्ल अधिक उपयुक्त है क्योंकि नस्ल को कम चारे की आवश्यकता होती है.

बेहद कम है खुराक: आमतौर पर रात के समय इस नस्ल के पशुओं को घर से लगी छत, कच्ची मिट्टी की दीवारों से बने फूस की झोपड़ियों या खुले स्थानों पर रखा जाता है. इन पशुओं को बारिश के दौरान सुबह से शाम तक खुले चारागाहों में चराया जाता है. ताकि उन्हें हरा चारा मिल सके. रात के समय आमतौर पर सूखा चारा दिया जाता है और अगर जरूरत पड़े तो हरा चारा भी दिया जाता है. बारिश के बाद पहाड़ी इलाकों में उगी हुई घास को काटकर पूरे साल के लिये संग्रहित किया जाता है. सर्दी और गर्मी के मौसम में सुबह अथवा पूरे दिन पशुओं को चराते रहते हैं. इसके अलावा किसान खेत में मक्का, ज्वार, बाजरा की कटाई के बाद सूखे पौधों को चारे के रूप में दिया जाता है.

Written by
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