नई दिल्ली. फिशरीज एक्सपर्ट कहते हैं कि पुराने तरीके से मछली पालन करने से कहीं बेहतर है, केज कल्चर से मछली पालन करना. नई तकनीकें मछली पालन में उत्पादन बढ़ा देती हैं. इससे मछली पालकों को खूब फायदा मिलता है. इस बात को कई मछली किसानों ने सच कर दिखाया है. बिहार में पारंपरिक मास्य पालन से आगे बढ़ते हुए चांदन डैम अब आधुनिक केज कल्चर फिश फार्मिंग का सफल माहल बनकर उभर रहा है. डैम में स्थापित फ्लोटिंग केजों में वैज्ञानिक तरीके से मत्स्य पालन कर रहे शहबाज आलम जिले ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार के मत्स्य पालकों के लिए प्रेरणा बन गए हैं.
आधुनिक तकनीक के जरिए कम जल क्षेत्र में अधिक, सुर्वक्षत और गुनवत्तापूर्ण मछली उत्पादन संभव हो रहा है. शहबाज आलम ने बताया कि 2004 में चांदन डैम में केज कल्चर की शुरुआत की गई थी. शुरुआती दौर आसान नहीं रहा है, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और आज बेहतर रिजल्ट मिल रहा है.
केज कल्चर से मिल रहा फायदा
पिछले वर्ष तेज आंधी में मछलियों से भरा एक केज पलट गया, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा.
इसके अलावा बीमारी से भी मछलियां मर गई थीं. तमाम चुनौतियों के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और तकनीकी सुधार के साथ मछली पालन को नई दिला दी.
डैम में लगाए गए अलग-अलग फ्लोटिंग केजो में रोहू, कत्ला और पंगेशियस फिश के साथ फार्मिंग की शुरुआत की गई है.
कतला और पंगेशियस जैसी विभिन्न प्रजातियों की मछलियों से फायदा मिल रहा है. मछलियों के आकार और वजन बढ़ने के साथ उन्हें अलग-अलग केजों में स्थानांतरित किया जाता है.
सुरक्षा और निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं. जबकि कैमरा और प्रकाश व्यवस्था सोलर इन्वर्टर से संचालित होती है.
मछलियों को निर्धारित समय पर संतुलित आहार भी दिया जाता है. शहबाज ने बताया कि अगले दो महीने में करीब 100 टन मछली उत्पादन का लक्ष्य है.
उत्पादित मछलियों की बिक्री जिले के विभिन्न प्रखंडों के अलाव कहलगांव के बाजारों में भी की जाती है.
उन्होंने कहा कि बिहार सरकार एवं मत्स्य संसाधन विभाग से मिले प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग के कारण बेहतर उत्पादन संभव हो सका है.
साथ ही उन्होंने डैम में और अधिक केज लगाने की मांग भी की है. जिला मत्स्य अधिकारी कन्हैया कुमार ने बताया कि चंदन डैम में लगाया गया केज कल्चर मत्स्य पालक शहबाज के द्वारा संचालित किया जा रहा है. बहुत जल्द और केज की संख्या बढ़ाई जाएगी.












