नई दिल्ली. पारंपरिक तरीकों की कमियों को दूर करने के लिए, कई पोल्ट्री फॉर्म अब बायोलॉजिकल तरीकों को अपना रहे हैं जो लीटर (मुर्गियों की बीट और बिछावन का मिश्रण) को स्थिर करने के लिए माइक्रोब्स और एंजाइम की शक्ति का इस्तेमाल करते हैं. साबित हो चुके तरीकों में ABTL के खास सॉल्यूशन फ्लाईजाइम और एनवायरोजाइम शामिल हैं, जिन्हें सीधे लीटर पर डाला जाता है. ये घरेलू मक्खी के जीवन चक्र को रोकते हुए लीटर के अपघटन (decomposition) को तेज करता है. ऑर्गेनिक पदार्थों के टूटने की प्रक्रिया को बढ़ाकर, फ्लाईजाइम ऐसी स्थितियां बनाता है जो मैगट (मक्खी के लार्वा) के जीवित रहने के लिए अनुकूल नहीं होतीं, जिससे लार्वा प्रभावी ढंग से मर जाते हैं और वयस्क मक्खियों में नहीं बदल पाते.
यह तरीका समस्या को उसकी जड़ से खत्म करता है, जिससे मक्खियों की आबादी पर लंबे समय तक नियंत्रण बना रहता है. ये फायदेमंद माइक्रोब्स का एक खास मिश्रण जिसका मकसद पोल्ट्री लीटर से निकलने वाली बदबू को कम करना है.
पोल्ट्री फार्म में हवा की गुणवत्ता बेहतर होती है
एक्सपर्ट का कहना है कि ये पोषक तत्वों को स्थिर करके और अमोनिया व वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड छोड़ने वाली माइक्रोबियल अपघटन प्रक्रियाओं को सीमित करके, एनवायरोजाइम बदबू को काफी हद तक कम करता है.
इससे न केवल पक्षियों और काम जकरने वालों के लिए शेड के अंदर हवा की गुणवत्ता बेहतर होती है, बल्कि आस-पास के समुदायों से आने वाली शिकायतें भी कम होती हैं.
ये बायोलॉजिकल टूल मिलकर दोहरा फायदा देते हैं. फ्लाईजाइम अपघटन को मजबूत करता है और लार्वा अवस्था में ही मक्खियों के प्रजनन को रोकता है.
जबकि एनवायरोजाइम लीटर के पोषक तत्वों को स्थिर करके बदबू की समस्या से निपटता है.
कई कमर्शियल पोल्ट्री फार्म में किए गए फीील्ड ट्रायल ने इन बायोलॉजिकल तरीकों की प्रभावशीलता को साबित किया है.
ये नतीजे दिखाते हैं कि फ्लाईजाइम और एनवायरोजाइम जैसे संयुक्त माइक्रोबियल-एंजाइमेटिक तरीके पोषक तत्वों के स्थिरीकरण के लिए भी सही है.
साथ ही बदबू में कमी और लार्वा अवस्था में मक्खी नियंत्रण के ज़रिए लीटर की गुणवत्ता में काफी सुधार कर सकते हैं.
ऐसे नतीजे अकेले फिजिकल या केमिकल तरीकों से लगातार हासिल नहीं किए जा सकते.
निष्कर्ष
पोल्ट्री लीटर का प्रबंधन केवल साफ-सफाई का काम नहीं है. यह फार्म के प्रदर्शन, पर्यावरण पर असर और समुदाय के साथ संबंधों का एक अहम कारक है. हालांकि फिजिकल और केमिकल तरीकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है, लेकिन मक्खियों और बदबू को नियंत्रित करने में उनकी कमियां तेज़ी से साफ़ हो रही हैं. इन चुनौतियों से उनकी बायोलॉजिकल जड़ पर जाकर निपटना, न कि केवल अस्थायी समाधान अपनाना, मज़बूत और टिकाऊ पोल्ट्री उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ने का सही रास्ता है.










Leave a comment