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NDRI ने बताया प्राकृतिक खेती का महत्व, जानिए गाय के गोबर से खाद बनाकर कैसे बढ़ाएं खेत की उर्वरा शक्ति

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प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी लेती स्वयं सहायता समूह की महिलाएं.

नई दिल्ली. लगातार रसायनिक पदार्थ खेती के लिए और भी खतरनाक साबित हो रहे है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि फर्टिलाइजर और कीटनाशक दवाओं के प्रयोग से फसल के बेहद जरूरी पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश (एनपीके) के साथ अरबों की संख्या में भूमि के मित्र बैक्टीरिया जल जाते हैं. ये फसल खाने में भी नुकसान देती है. इसलिए लोगों को प्राकृतिक खेती पर ध्यान देने की जरूरत है. इसी को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान करनाल में कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा 21 मार्च 2024 प्राकृतिक खेती विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला और जागरूकता अभियान प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया. इसमें बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लेकर प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी हासिल की. उन्होंने बताया कि जब हम देसी खाद तैयार करेंगे तो हमें पशुओं की भी आवश्यकता होगी, इसलिए ज्यादा से ज्यादा पशुओं को भी पालने की जरूरत है, जिससे ज्यादा से ज्यादा खाद घर पर बनाई जा सके.

राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान करनाल के निदेशक डॉ. धीर सिंह के मार्गदर्शन आयोजित किए गए इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में 72 महिला प्रतिभागियों ने भाग लिया. सभी महिला प्रतिभागीयो को डॉ. सतीश कुमार ने बताया कि आजकल के जीवन में प्राकृतिक खेती को अपनाना अत्यंत जरुरी है और एक देशी गाय के गोबर में कई करोड़ जीवाणु होते हैं. प्राकृतिक खेती में उपयोगी अव्यव जैसे बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र, ब्रम्हास्त्र को बनाने में देशी गाय का गोबर एवं गोमूत्र बहुत उपयोगी है. एक गाय से 30 एकड़ भूमि में प्राकृतिक खेती की जा सकती है. प्राकृतिक खेती में आच्छादन का विशेष महत्व है जिसमें भूमि की उपरी सतह पर नमी बनी रहती है एवं जीवाणु सक्रिय रहते है.

प्राकृतिक खेती का महत्व बताया
अश्वनी कुमार ने बताया कि प्राकृतिक खेती पद्धति में केंचुओं की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है जो भूमि में न केवल नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं बल्कि भूमि के भौतिक गुणों में सुधार करते हैं. देशी गाय के गोबर व गो मूत्र में ऐसे गुण विद्यमान होते है जो कि केंचुओं को स्वत: आकर्षित करते हैं और केंचुओं की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है, जिससे की भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है.सभी महिला प्रतिभागीयो को जीवामृत, घनजीवामृत बनाकर दिखाया गया एवं दर्शप्रणी अर्क, खट्टी लस्सी द्वारा फफूंद नाशक से विभिन्न फसलों में होने वाली बिमारियों व कीट पतंगों की रोकथाम के बारे में जानकारी दी.

घर बैठे ऐसे बनाएं खाद
एक एकड़ भूमि के लिए लगभग 200 लीटर जीवामृत एवं 8 से 10 क्विंटल घनजीवामृत पर्याप्त होता है, 100 किग्रा. घनजीवामृत बनाने के लिए 100 किग्रा सूखा बारीक़ किया हुआ गोबर, 1 किग्रा. गुड़, 2 किग्रा. दलहन का आटा एक किग्रा, एक खेती की मिट्टी व 5 लीटर गोमूत्र की आवश्यकता होती है. इस सभी को 4-5 दिनों तक छाया में सुखाया जाता है एवं घनजीवामृत को बारीक़ करने के बाद खेत में 6 महीने तक सिंचाई से पहले उपयोग में लाया जाता है.

स्वयं सहायता समूहों को दी सब्जियों की किट
कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. राजेन्द्र सिंह का योगदान रहा, जिन्होंने सभी महिला प्रतिभागियों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए जागरूक किया. कार्यक्रम के समापन पर महिलाओं को प्राकृतिक खेती द्वारा आत्म निर्भर एवं आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए स्वयं सहायता समूह की महिला प्रतिभागियों को प्राकृतिक खेती के लिए जीवामृत बनाने के लिए 11 ड्रम एवं गुड़ और बेसन के साथ-साथ जायद मौसम की सब्जियों की किट भी वितरित की गई.

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