नई दिल्ली. देश की विशाल समुद्री संपदा के बावजूद भारत के व्यापक समुद्री संसाधनों का अभी भी काफी हद तक उपयोग नहीं हो पाया है. 11,099 किलोमीटर लंबी तटरेखा, 22 लाख वर्ग किलोमीटर के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (ईईजैड) और 53.1 लाख टन की अनुमानित समुद्री मत्स्य क्षमता के साथ भारत में सतत मत्स्य पालन, गहरे समुद्र में मछली पकड़ने, समुद्री जलीय कृषि (मैरिकल्चर) और नीली अर्थव्यवस्था के विकास की अपार संभावनाएं हैं. लक्षद्वीप इस अप्रयुक्त क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है. यहां लगभग 4 लाख वर्ग किलोमीटर का अनन्य आर्थिक क्षेत्र (ईईजैड) है, जो भारत के कुल ईईजैड का लगभग 17 प्रतिशत है, तथा 4,200 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला लैगून है.
यह बड़ा और संसाधन-संपन्न समुद्री इकोसिस्टम उच्च-मूल्य वाले मत्स्य संसाधनों के दोहन, मैरिकल्चर के विस्तार, तटीय आजीविकाओं के सृजन तथा सतत नीली अर्थव्यवस्था के विकास को गति देने की महत्वपूर्ण संभावनाएं प्रदान करता है.
सरकार मत्स्य पालन क्षेत्र में एकीकृत और मूल्य श्रृंखला-आधारित विकास को बढ़ावा देने के लिए क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण अपना रही है.
सजावटी मत्स्य पालन के विकास को दिया जा रहा है बढ़ावा
इसी रणनीति के अनुरूप, लक्षद्वीप को समुद्री शैवाल की खेती, प्रोसेसिंग, मूल्य संवर्धन और बाजार संपर्क को बढ़ावा देने के लिए एक समर्पित समुद्री शैवाल क्लस्टर के रूप में अधिसूचित किया गया है.
लक्षद्वीप के द्वीप समुद्री सजावटी मत्स्य संसाधनों से भी समृद्ध हैं, जो समुद्री इकोसिस्टम के संरक्षण के साथ-साथ सतत पालन, निर्यात और आजीविका सृजन की महत्वपूर्ण संभावनाएं प्रदान करते हैं.
आउटरीच कार्यक्रम के दौरान उपराष्ट्रपति मत्स्य पालन क्षेत्र के लाभार्थियों को विभिन्न लाभ वितरित करेंगे तथा “मिशन रंगीन मछली 2031”—सजावटी मत्स्य पालन के विकास के लिए रणनीतिक कार्ययोजना—जारी करेंगे.
यह रणनीतिक कार्ययोजना सजावटी मत्स्य पालन की संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में वैज्ञानिक प्रबंधन, जैव-सुरक्षा, गुणवत्ता आश्वासन और नियामक अनुपालन के लिए एक समान रूपरेखा प्रदान करेगी.
मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) ब्रूडस्टॉक प्रबंधन, प्रजनन, हैचरी संचालन, उत्पादन प्रणालियों, क्वारंटीन, स्वास्थ्य प्रबंधन, ट्रेसेबिलिटी, एक्वेरियम संचालन, हैंडलिंग, परिवहन और व्यापार से संबंधित प्रक्रियाओं को मानकीकृत करेंगी.
इससे पूरे देश में कार्यप्रणालियों में एकरूपता सुनिश्चित होगी और सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों को अपनाने को बढ़ावा मिलेगा.
ये पहल हितधारकों की क्षमताओं को मजबूत करने, उत्पाद की गुणवत्ता और जैव-सुरक्षा मानकों में सुधार करने के लिए जरूरी है.
साथ ही प्रमाणन एवं बाजार तक पहुंच को सुगम बनाने तथा भारत के सजावटी मत्स्य पालन क्षेत्र के सतत, सुव्यवस्थित और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विकास को समर्थन प्रदान करने में भी सहायक होंगी.











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