नई दिल्ली. पशु को ईयर टैग लगाने के कई फायदे हैं. ईयर टैगिंग के दौरान पशुओं को टीकाकरण प्रमाण-पत्र फ्री दिया जाता है, जिसमें टीकाकरण, कृमिनाशन एवं अगली तिथि का विवरण दर्ज रहता है. इसके कई फायदे होने के बावजूद बहुत से पशुपालक भाई पशु की ईयर टैगिंग कराने से कतराते हैं. उनके मन में कई सारे नकारात्मक विचार इसको लेकर होते हैं. इससे वो ईयर टैगिंग नहीं कराते हैं. जबकि इससे पशुओं को एक यूनिक पहचान भी मिलती है. मान लीजिए आपके पास 20 गाय हैं तो उनकी पहचान मुश्किल होती है. क्योंकि एक बार जब दुधारू गाय आपस में मिल जाए तो उनकी पहचान नहीं हो पाती है.
इससे पशु को सरकारी रिकॉर्ड से जोड़ा जा सकता है. जबकि सरकारी रिकॉर्ड के लिए नंबर जरूरी होता है. इसका एक फायदा ये भी है कि स्वास्थ्य प्रबंधन भी आसानी से किया जा सकता है. हालांकि ईयर टैगिंग कराते वक्त कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए. जिसकी जानकारी पशुपालक भाइयों को होनी चाहिए. आइए इस बारे में जानते हैं.
किन बातों ध्यान रखें
एक्सपर्ट कहते हैं कि टैगिंग पूर्व कान को एंटीसेप्टीक लोशन से अच्छी तरह साफ करें.
टैग लगने 2-4 दिनों तक गंदगी से बचाव करें.
कान के अंदर वाले हिस्से में टैग के फ्लैप को और उपर में मेटल पार्ट को रखें.
एप्लिकेटर को मेटल भाग टूटने पर बिना बदले टैग न लगायें.
पूर्व से 12 डिजिट का अगर टैग लगा हो तो दोबारा टैग न लगायें.
कान में सूजन या घाव होने की स्थिति में, घाव को एंटीसेप्टीक से साफ कर हायमैक्स या टोपीक्यूर मलहम लगायें तथा अन्य आवश्यक उपचार भी यदि जरूरी समझे तो करें.
पशु को बिना काबू में किए टैग नहीं लगाये.
कान के उपरी हिस्से में टैग के फ्लैप को नहीं लगाना चाहिए.
टैग लगाने के लिए वेन (सीरा) रहित स्थान का चुनाव करें. खून निकलने की स्थिति में 2-3 बूंद एंटीसेप्टीक लोशन डालें.
टैग लगाते समय ध्यान रखें कि कान की मुख्य रक्त वाहिकाओं (नसों/धमनियों) या कार्टिलेज में छेद न हो.
एप्लिकेटर में टैग लगाकर मेटल वाले भाग में एंटीसेप्टीक लोशन लगाये बिना टैग न लगायें.
जब जानवर भीगे हो या बहुत तेज हवा चल रही हो, तब टैगीग न करें, इससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.
एप्लीकेटर मशीन बहुत तेज होती है इसलिए लीवर को झटके से न दबायें.
निष्कर्ष
ईयर टैगिंग में इन बातों का ध्यान देने से आपके पशु को किसी भी तरह की कोई दिक्कत नहीं आएगी.










