नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश सरकार कृषि और पशुपालन को एकीकृत करके किसानों की आय बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है. इसी क्रम में, गोबर-आधारित खाद, बायोगैस, जीवामृत और घनामृत के उत्पादन, उपयोग और बिक्री के संबंध में एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की जा रही है. पशुपालन और कृषि विभागों के अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे राज्य में गौशालाओं को उत्पादन केंद्रों के रूप में विकसित करें और उन्हें खाद, जीवामृत तथा अन्य जैविक उत्पादों के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाएं. राज्य के पशुपालन मंत्री धर्मपाल सिंह ने सोमवार को पशुपालन विभाग और कृषि विभाग के साथ एक उच्च-स्तरीय बैठक में गोबर से बनने वाली खाद, बायोगैस, जीवामृत तथा घनामृत के उत्पादन, उपयोग और विपणन के लिए एक व्यापक कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश दिया.
बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि योगी सरकार की प्राथमिकता किसानों की आय बढ़ाना, साथ ही मिट्टी की उर्वरता को बहाल करना है. उन्होंने कहा कि राज्य में उपलब्ध गोबर संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करके बड़े पैमाने पर जैविक खाद का उत्पादन संभव है, और इसके माध्यम से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता को कम किया जा सकता है. उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे राज्य में गौशालाओं को उत्पादन केंद्रों के रूप में विकसित करें और उन्हें खाद, जीवामृत तथा अन्य जैविक उत्पादों के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाएं.
सफल मॉडलों का होगा अध्ययन
मंत्री ने कहा कि राज्य में लाखों मीट्रिक टन खाद उत्पादन की अनुमानित क्षमता है, जिसके लिए गौशालाओं, डेयरी इकाइयों और किसानों के स्तर पर समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है.
झांसी, चंदौली, फर्रुखाबाद, कानपुर और बाराबंकी जैसे जिलों में संचालित सफल बायोगैस और जैविक खाद मॉडलों का उल्लेख करते हुए, उन्होंने निर्देश दिया कि इन मॉडलों का अध्ययन किया जाए और पूरे राज्य में इनका विस्तार सुनिश्चित किया जाए.
बैठक में संपीड़ित बायोगैस (CBG) संयंत्रों के विस्तार, गोबर गैस संयंत्रों की स्थापना और कृषि अपशिष्ट के उचित उपयोग पर भी विस्तृत चर्चा हुई.
मंत्री ने कहा कि बायोगैस न केवल ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ाएगी, बल्कि इससे निकलने वाली स्लरी (अवशेष) खेतों के लिए अत्यंत उपयोगी होगी, जिससे किसानों को दोहरा लाभ प्राप्त होगा.
मंत्री धर्मपाल सिंह ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे गोबर-आधारित खाद की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए उसे मानकीकृत करें.
उन्होंने कहा कि पैकेजिंग, नमी के स्तर और गुणवत्ता के लिए स्पष्ट मानक तय किए जाने चाहिए, ताकि किसानों को भरोसेमंद और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद मिल सकें.
इसके साथ ही, सहकारी समितियों के माध्यम से गोबर की खाद की उपलब्धता बढ़ाने और यूरिया के साथ-साथ इसके उपयोग को बढ़ावा देने की संभावनाओं को भी तलाशा जाना चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा कि गोबर आधारित खाद मिट्टी में कार्बनिक कार्बन को बढ़ाती है और लंबे समय में उत्पादन क्षमता को मजबूत करती है.
इस दिशा में, वैज्ञानिकों, कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों को शामिल करके सरल और कम लागत वाले मॉडल विकसित करने के निर्देश दिए गए.
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि गोबर गैस प्लांटों की स्थापना को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं तैयार की जानी चाहिए, ताकि अधिक से अधिक किसानों को इससे जोड़ा जा सके.
इसके साथ ही, जैविक खाद के लिए एक प्रभावी विपणन प्रणाली विकसित करने पर भी जोर दिया गया, ताकि उत्पाद आसानी से किसानों तक पहुँच सकें और उन्हें बेहतर दाम मिल सकें.
उन्होंने कहा कि योगी सरकार कृषि और पशुपालन को एकीकृत करके राज्य में जैविक खेती को एक नई दिशा देने के लिए प्रतिबद्ध है.
गोबर आधारित उत्पादों के व्यापक उपयोग से पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और किसानों की आय में स्थायी वृद्धि सुनिश्चित होगी.












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