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Poultry: मीट के लिए देसी मुर्गों को पालें या ब्रॉयलर चिकन, यहां जानें

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पोल्ट्री बर्ड की प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली. यदि आप पोल्ट्री फार्मिंग मीट उत्पादन के लिए करना चाहते हैं तो आप ब्रॉयलर चिकन को भी पाल सकते हैं और देसी मुर्गों को भी पाल सकते हैं लेकिन दोनों के मीट में कुछ फर्क होता है. दोनों के पालने में भी फर्क होता है. सबसे पहले जान लें कि ब्रॉयलर चिकन तेजी से बढ़ाने के लिए पाले जाते हैं और उनका मांस नर्म और कोमल होता है. जबकि देसी चिकन प्राकृतिक रूप से घूम फिर कर या बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग के जरिए पाले जाते हैं और इनका मीट सख्त और रेशेदार होता है लेकिन स्वादिष्ट भी ज्यादा होता है.

बिहार सरकार के पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग (Department of Animal and Fishery Resources) के एक्सपर्ट ने लाइव स्टॉक ​एनिमल न्यूज (Livestock Animal News) को बताया गया कि दोनों तरह की फार्मिंग में कुछ फर्क है. अपने—अपने इनके फायदे भी हैं. हालां​कि बिजनेस के लिहाज से दोनों ही काम बेहतर है. आइए दोनों तरह की फार्मिंग के फर्क के बारे में यहां जानते हैं.

ब्रॉयलर मुर्गे इतने दिनों हो जाते हैं तैयार
ब्रॉयलर मुर्गों को तेजी से वजन बढ़ाने के लिए खास तरह का फीड दिया जाता है. कभी-कभी हार्मोन भी दिए जाते हैं. जबकि देसी मुर्गों का आहार प्राकृतिक होता है.

ब्रॉयलर चिकन की बात की जाए तो यह तेजी से बढ़ते हैं. 6 से 8 हफ्तों में ही इस्तेमाल करने योग्य हो जाते हैं.

ब्रॉयलर को ऐसा फीड खिलाया जाता है जिससे यह तेजी से बढ़ते हैं ताकि इन्हें बेच दिया जाए और कमाई हो सके.

ब्रॉयलर चिकन का मीट बहुत नर्म, कोमल और रसदार होता है. क्योंकि इन्हें कम एक्सरसाइज का मौका मिलता है यह एक ही जगह बैठे—बैठे फीड खाकर बढ़ जाते हैं.

ब्रॉयलर चिकन को पालने के लिए फार्म बनवाना होता है और वहीं उन्हें फीड, पानी और उनकी जरूरतें के सामान दिया जाता है.

देसी मुर्गों को कैसे पाला जाता है
देसी मुर्गों की बात की जाए तो इनकी ग्रोथ धीमी होती है और यह तैयार होने में ज्यादा समय लेते हैं.

देसी मुर्गे प्राकृतिक रूप से घूम कर अपना फीड खा लेते हैं. वैसे इन्हें आहार में मक्का चावल जैसे प्राकृतिक भोजन को भी दिया जाता है.

बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग के जरिए घर के आंगन या घर के पीछे खाली हिस्से में भी इन्हें पाला जा सकता है. जिसमें चिकन वेस्ट और अनाज खाकर भी ये पल जाते हैं. इनको पालने पर खर्च कम आता है.

वही इनका मीट टेस्टी और रेशेदार होता है. चबाने में कठिन होता है. इन्हें अलग-अलग रंगों में भी देखा जाता है लेकिन देसी चिकन का मांस बेहद ही स्वादिष्ट माना जाता है.

निष्कर्ष
दोनों ही तरह के मीट को पालकर कमाई की जा सकती है.​ बिजनेस के लिहाज से दोनों ही काम बेहतर हैं. इसलिए किसान अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए ये काम कर सकते हैं.

Written by
Livestock Animal News Team

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