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Dairy: साइलेज बनाने के लिए 3 सबसे अच्छी फसल कौन सी है, जानें यहां

साहलेज हरे चारे का एक वैकल्पिक स्रोत है, जिसे किसी भी अन्य सूखे चारे, हरे चारे और पशु आहार के साथ मिश्रित करके पशुओं को खिलाया जा सकता है.
प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली. साइलेज एक संरक्षित चारा होता है, जिसे जहां हवा न पहुंचे ऐसी जगह रखा जाता है. हरे चारे का फर्मेन्टेशन करके इसे तैयार किया जाता है. अनाज की चारे वाली फसलें, जो कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होती हैं, उनसे अच्छा साइलेज बनता है. सरफेस साइलो में लगभग 5-1000 टन हरे चारे को संरक्षित किया जा सकता है. साइलेज बनाने के लिए फसल की 30-35 फीसद शुष्क पदार्थ की अवस्था में कटाई की जाती है. फसल को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है. साइलो में कटा हुआ चारा भर देते हैं और हरे चारे को अच्छी तरह हाथों से या मशीन की सहायता से दबाते हैं.

साइलो को पॉलिथीन शीट से अच्छी तरह बन्द कर दिया जाता है. फिर इसे मिट्टी से ढका जाता है. साइलो को 45 दिन तक इस अवस्था में छोड़ना पड़ता है इसके बाद साइलेज पशुओं को खिलाने लायक हो जाता है.

फसलों के बारे में पढ़ें यहां
ज्वार साइलज बनाने के लिए ज्वार अच्छी फसल मानी जाती है. ये गर्मी और बरसात के मौसम में उगाई जाने वाली यह एक महत्त्वपूर्ण अनाज वाली चारा फसल है.

ठंडे पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर, ज्वार को देश के सभी हिस्सों में उगाया जाता है. इसकी एक कट वाली, दो कट वाली और बहु कट वाली देशी प्रजातियां, संकर प्रजातियां उपलब्ध हैं.

जिनसे 50-100 टन प्रति हेक्टर हरा चारा 1-6 कटाई में प्राप्त हो जाता है. महत्वपूर्ण प्रजातियों में पोसी-1, पीसी-6, पीसी-9, पीसी-23, एचसी-136, एचसी-171, पोएससी-1, पंतचरी-5, पंतचरी-6 और संकर सौरघम सूडान है.

मक्का अनाज की चारे वाली फसलों में सर्वोत्तम है, जिसको गरमी, बरसात एवं सर्दी की शुरुआत में उगाया जा सकता है.

इसका हरा चारा पोषक तत्त्वों से भरपूर होता है एवं इसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा भी अधिक होती है.

इसका हरा चारा साइलेज बनाने के लिए खास तौर से उपयुक्त होता है. इससे 30 से 40 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है. महत्वपूर्ण प्रजातियों में अफ्रीकन टॉल, जेएस-1006 और विजय कंपोजिट है.

जई ठंडे अनाज की चारे वाली फसल है, जिसको आमतौर पर बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में उगाया जाता है.

यह बहुत तेजी से बढ़ने वाली फसल है, जिसमें कटाई के पश्चात् फिर से बढ़ने की ताकत होती है. इसका चारा स्वादिष्ट, सुपाच्य तथा कार्बोहाइड्रेट से परिपूर्ण होता है.

इसकी उपज 30 से 50 टन प्रति हेक्टेयर होती है. यह फसल हे और साइलेज बनाने के लिए भी प्रयोग की जा सकती है.

महत्वपूर्ण प्रजातियों में केंट, यूपीओ-94, यूपीओ-212, ओएस-6, ओएस-7, ओएल-9, जेएचओ-822, जेएचओ-851 और एचएफओ-114 है.

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