Home पशुपालन Buffalo Farming: भारत के किन क्षेत्रों में घट रही भैंसों की संख्या, जानें क्या है इसकी वजह
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Buffalo Farming: भारत के किन क्षेत्रों में घट रही भैंसों की संख्या, जानें क्या है इसकी वजह

कार्यक्रम में मौजूद गेस्ट.

नई दिल्ली. इंडियन सोसायटी फॉर बफैलो डेवलपमेंट (ISBD) द्वारा भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई), इज्जतनगर में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान, डॉ. के.एम. एल. पाठक पूर्व महानिदेशक (पशु विज्ञान), आईसीएआर और पूर्व कुलपति उत्तर प्रदेश पंडित दीन दयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गौ अनुसंधान( दुवासू) मथुरा ने सबसे ज्यादा प्रजनन वाले भारत के क्षेत्रों में घटती भैंसों की संख्या पर चिंता जाहिर की. उन्होंने इसके पीछे की वजह भी गिनाई. साथ ही ये भी बताया कि कैसे इस समस्या से निपटा जा सकता है.

डॉ. पाठक ने भैंस उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों पर बोलते हुए कहा कि हीट तनाव, प्रजनन समस्याएं और स्वास्थ्य प्रबंधन आज प्रमुख मुद्दे हैं. जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को लेकर पहले संदेह था, लेकिन अब यह वास्तविकता बन चुका है और वैज्ञानिकों ने इसे साबित कर दिया है. ऐसे में जलवायु-अनुकूल भैंस उत्पादन मॉडल विकसित करना समय की जरूरत है.

भैंस पालन के हैं कई फायदे
उन्होंने चिंता व्यक्त किया कि हरियाणा और पंजाब जैसे प्रजनन क्षेत्रों में भैंसों की संख्या घट रही है, जो शुभ संकेत नहीं हैं.

इसके लिए नीति निर्माताओं को जागरूक करने, प्रसार सेवाओं को सशक्त बनाने और वैज्ञानिकों के बीच अधिक परस्पर सहयोग की जरूरत है. उन्होंने कहा कि भैंस आधारित पशुधन अर्थव्यवस्था आज ग्रामीण भारत की मुख्य चालक शक्ति बन चुकी है.

उन्होंने जोर देते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है और भैंस इस चुनौती के प्रति बेहद संवेदनशील पशु है, इसलिए अनुसंधान, नीति और प्रसार सेवाओं में समन्वित प्रयास आवश्यक हैं.

डॉ. पाठक ने कहा कि पशुधन क्षेत्र अब सहायक नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ बन चुका है और सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान लगातार बढ़ रहा है.

भैंस न केवल पोषण और नियमित आय का साधन है, बल्कि रोजगार सृजन में भी इसकी बड़ी भूमिका है.

अपने संबोधन में डॉ. पाठक ने कहा कि देश में भैंस दूध का योगदान कुल दुग्ध उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक है और भारत विश्व में लगातार कई वर्षों से दुग्ध उत्पादन में प्रथम स्थान पर है.

उन्होंने स्पष्ट किया कि भैंस का दूध भी A2 श्रेणी का होता है, जिसे लेकर पहले कई भ्रांतियाँ थीं। आज “ब्लैक गोल्ड” कही जाने वाली भैंस छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका का प्रमुख आधार है.

उन्होंने आईएसबीडी द्वारा नियमित अंतराल पर वार्षिक सम्मेलन आयोजित करने की परंपरा की सराहना करते हुए कहा कि आज के समय में कई संगठन ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, जबकि आईएसबीडी इस दिशा में निरंतर सक्रिय है.

उन्होंने 2018 में आयोजित 9वें एशियन बफैलो कांग्रेस तथा अन्य राष्ट्रीय आयोजनों में संस्था की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया.

डॉ. पाठक ने आंध्र प्रदेश के प्रगतिशील भैंस पालक राजीव को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की.

Written by
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