नई दिल्ली. प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत हरियाणा ने उल्लेखनीय प्रगति की है और 760.88 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया है. इसमें केंद्र सरकार का हिस्सा 262.17 करोड़ रुपये है. आईलैंड फिशरीज की क्षमता को बढ़ाने के लिए टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में कुल 79.47 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप 456 आरएएस और बायोफ्लॉक प्रणालियां स्थापित की गई हैं. अब तक, 176.32 करोड़ रुपये की कुल लागत से 3,766 हेक्टेयर के तालाब, 2,204 हेक्टेयर के खारे और क्षारीय जल क्षेत्र के लिए परियोजनाएं निर्धारित की गई हैं.
इसके अतिरिक्त, राज्य में मत्स्यपालन के विकास को बढ़ावा देने के लिए 98.90 करोड़ रुपये की लागत से एक एकीकृत एक्वापार्क को मंजूरी दी गई है. उपायुक्त ने सिरसा में 110 करोड़ रुपये की लागत से एकीकृत एक्वापार्क की स्थापना की घोषणा की, साथ ही कटाई के बाद की प्रक्रिया और मूल्यवर्धन को मजबूत करने के लिए शीत भंडारण अवसंरचना के विकास की भी घोषणा की.
मछली पालन का कलस्टर होगा मजबूत
जिला मजिस्ट्रेट ने यह भी आश्वासन दिया कि राज्य सरकार मछली पालन क्लस्टर को और अधिक मजबूत तथा सुदृढ़ बनाने के लिए केंद्र के साथ मिलकर काम करेगी.
झींगा भारत का प्रमुख समुद्री खाद्य निर्यात बना हुआ है, और 2024-25 के दौरान देश के समुद्री उत्पादों के निर्यात में जमे (फ्रोजन) झींगे का मूल्य लगभग 69 प्रतिशत रहा.
पिछले एक दशक में भारत के समुद्री उत्पादों का निर्यात लगभग दोगुना हो गया है, जो 2013-14 में 30,213 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 62,408 करोड़ रुपये हो गया है. इसमें मुख्य योगदान 43,334 करोड़ रुपये मूल्य के झींगे के निर्यात का रहा है.
गौरतलब है कि भारत के समुद्री खाद्य क्षेत्र को लगभग 658 प्रसंस्करण संयंत्रों, 532 पूर्व-प्रसंस्करण इकाइयों और ताजी, ठंडी, जीवित, सूखी और नमकीन मछलियों के लिए व्यापक प्रबंधन केंद्रों के नेटवर्क के साथ-साथ देश भर में 734 से अधिक शीत भंडारण सुविधाओं से मदद मिलती है.
केंद्रीय मत्स्य विभाग ने प्रमुख क्षेत्रों में 34 मत्स्य उत्पादन और प्रसंस्करण क्लस्टरों को अधिसूचित किया है.
जिनमें हजारीबाग में मोती क्लस्टर, लक्षद्वीप में समुद्री शैवाल, मदुरै में सजावटी मत्स्य पालन, झारखंड में मोती क्लस्टर बनाया जाएगा.
सिरसा जिले में खारा जल मछली पालन का यह समूह फतेहाबाद, हिसार और रोहतक के साथ भागीदार जिलों के रूप में यह दर्शाता है कि किस प्रकार क्षेत्र-विशिष्ट मत्स्य पालन विकास खारे और क्षारीय क्षेत्रों की उत्पादक क्षमता को उजागर कर सकता है.
झींगा, स्कैम्पी और सीबास जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों में विविधता को बढ़ावा देकर, यह समूह संसाधनों का कुशल उपयोग सुनिश्चित करता है.
साथ ही किसानों की आय बढ़ाता है, स्थानीय रोजगार सृजित करता है और बाजार संबंधों को मजबूत करता है.











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