नई दिल्ली. मुर्गी पालन का काम मीट उत्पादन और अंडा उत्पादन के लिए किया जाता है. मीट उत्पादन के लिए ब्रॉयलर मुर्गों को फॉर्म में पाला जाता है और उन्हें फीड दिया जाता है. जब उनका वजन एक तय मानक तक पहुंच जाता है तो उन्हें मीट उत्पादन के लिए बेचा जाता है. वहीं लेयर मुर्गियों को अंडा उत्पादन के लिए फॉर्म में पाला जाता है और उन्हें तय समय पर फीड, रोशनी आदि दी जाती है. जिससे मुर्गियां अंडों का उत्पादन करती हैं. बाजार में बिकने वाले सफेद अंडे इन्हीं मुर्गियों से हासिल किए जाते हैं. जिनकी कीमत 6 से 10 रुपए के बीच रहती है.
आपको बता दें कि 18 से 19 हफ्ते की मुर्गियां आमतौर पर अंडा देना शुरू कर देती हैं और साल भर लगातार अंडों का उत्पादन करती हैं. बस इसके लिए उन्हें जरूरी रोशनी और पोषण देना होता है. एक्सपर्ट कहते हैं कि अंडों के उत्पादन के लिए चूजों को पाला जाता है और फिर उन्हें 16 से 19 हफ्ते प्रोटीन और तीन प्रतिशत कैल्शियम युक्त आहार दिया जाता है. जबकि 16 से 18 घंटे रोशनी दी जाती है. शेड में सफाई वेंटिलेशन का ख्याल रखा जाता है जिससे मुर्गी अंडे का उत्पादन करती हैं
ऐसे की जाती है देखभाल
लेयर मुर्गियों को 18 से 19 हफ्ते तक गुणवत्ता वाला लेयर फीड देना चाहिए. जिसमें 16 से 18 फीसद प्रोटीन रहना ही चाहिए.
वहीं अंडों के छिलके को मजबूती देने के लिए कैल्शियम दिया जाता है. जिसमें पिसी हुई सीप मुर्गियां खाती हैं. उनको हर समय स्वच्छ और ताजा पानी उपलब्ध कराया जाता है.
मुर्गियों को 16 से 18 घंटे रोशनी की जरूरत होती है. इसलिए उन्हें कृत्रिम रोशनी भी दी जाती है.
सर्दियों में जब दिन छोटे होते हैं सुबह या शाम को अतिरिक्त रोशनी के लिए बल्ब आदि की व्यवस्था फार्म में की जाती है.
शेड के अंदर वेंटीलेशन की जरूरत होती है. फॉर्म को सूख रखा जाता है. मुर्गियों के बैठने के लिए ऊंचे स्थान और अंडे देने के लिए सुरक्षित घोंसले बनाए जाते हैं.
मुर्गियों में तनाव को कम करने के लिए शिकारी से बचाने की तमाम व्यवस्था पोल्ट्री फार्मिंग के दौरान की जाती है.
मुर्गियों को कीड़ों की वजह से कई बीमारियां होती हैं. इस वजह से समय पर इसका इलाज किया जाता है. टीकाकरण वैक्सीनेशन भी कराया जाता है.
निष्कर्ष
मोटे तौर पर कहा जाए तो इस तरह से मुर्गियों को पाला जाता है और उनकी देखरेख की जाती है. जिसके बाद वो अंडा उत्पादन करने के लिए तैयार हो जाती हैं.











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