नई दिल्ली. एक बड़ी वैज्ञानिक और संस्थागत उपलब्धि के तौर पर, मथुरा की वेटनरी यूनिवर्सिटी (DUVASU) को ICAR-नेशनल ब्यूरो ऑफ एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज (ICAR-NBAGR), करनाल से दो खास देसी पशु आनुवंशिक संसाधनों ‘बत्तीसी बकरी’ और ‘ब्रज गधे’ – के ‘नेशनल रजिस्टर ऑफफ एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज’ में सफल रजिस्ट्रेशन की औपचारिक पुष्टि मिली है. यह वैज्ञानिक काम NBAGR द्वारा फंडेड ‘नेटवर्क प्रोजेक्ट ऑन एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज़ (AnGR)’ के तहत DUVASU, मथुरा के वैज्ञानिकों की एक मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम ने किया था.
इस प्रोग्राम को DUVASU के वाइस-चांसलर डॉ. अभिजीत मित्रा से लगातार प्रोत्साहन, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और संस्थागत सहयोग मिला है. डॉ. मित्रा खुद एनिमल जेनेटिक्स और ब्रीडिंग के क्षेत्र में एक जाने-माने वैज्ञानिक हैं, जिन्हें पशुधन के आनुवंशिक सुधार और रिप्रोडक्टिव बायोटेक्नोलॉजी में काफी अनुभव है. भारत के देसी पशु आनुवंशिक संसाधनों की पहचान (characterization), संरक्षण और वैज्ञानिक उपयोग पर उनके ज़ोर ने इस प्रोग्राम को महत्वपूर्ण संस्थागत गति प्रदान की है.
ब्रज गधे के बारे में जानें यहां
ब्रज गधे का नाम उसके मूल भौगोलिक क्षेत्र उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक ब्रज क्षेत्र, खासकर मथुरा, आगरा और आस-पास के इलाकों से पड़ा है.
इन जानवरों को पीढ़ियों से गधे पालने वाले पारंपरिक समुदायों द्वारा पाला-पोसा गया है, जिनकी आजीविका ऐतिहासिक रूप से इन्हीं पर निर्भर रही है.
वैज्ञानिक अध्ययनों में ब्रज गधे को मुख्य रूप से सफेद-स्लेटी रंग का, मजबूत बनावट और गहरे शरीर वाला, और सीधी पीठ वाला बताया गया है.
प्रकाशित जेनेटिक स्टडीज से इसकी अलग पहचान के और सबूत मिले हैं. ग्रे-टाइप की ब्रज आबादी, लद्दाख, स्पीति और रायलसीमा की ब्राउन-टाइप गधों की आबादी से अलग रही है.
यह गुजरात के रजिस्टर्ड हलारी गधे से भी शारीरिक रूप से अलग है; हलारी गधे बड़े होते हैं, उनका रंग ज़्यादातर सफेद होता है और वे हलार इलाके के सूखे और कम-सूखे चरागाह वाले माहौल के हिसाब से ढले होते हैं.
गधों के जेनेटिक संसाधनों को बचाने की ज़रूरत उनकी आबादी में तेज़ी से आई कमी से साफ़ पता चलती है.
20वीं पशुगणना (2019) के अनुसार, भारत में गधों की संख्या घटकर 1,23,587 रह गई थी (जिसमें उत्तर प्रदेश के 16,016 गधे शामिल थे), जबकि 2012 में देश भर में इनकी संख्या लगभग 3.2 लाख थी.
पारंपरिक रूप से, ब्रज गधों का इस्तेमाल ईंट, रेत, मिट्टी और निर्माण से जुड़ी दूसरी चीज़ें ढोने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है.
कम संसाधनों में भी लगातार काम करने की उनकी क्षमता ने उन्हें ईंट-भट्टों और निर्माण कार्यों से जुड़े आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के लिए बहुत कीमती बना दिया है.
वैज्ञानिक व्यवहार संबंधी शोध से पता चला है कि गधों में सीखने, याद रखने और समस्या सुलझाने की अच्छी क्षमता होती है, जो गधे को कम बुद्धि वाला जानवर मानने वाली आम धारणा को चुनौती देती है.
भारतीय सभ्यता के साथ भी गधे का पुराना नाता रहा है और प्राचीन भारतीय साहित्य में इसका जिक्र ‘गर्दभ’ और ‘रसभ’ के रूप में मिलता है.
अगली चुनौती यह पक्का करना है कि इस नस्ल की पहचान से न सिर्फ इसका संरक्षण हो, बल्कि इसे पालने वाले समुदायों की आजीविका भी बेहतर हो.
गधा पालन का भविष्य सिर्फ़ बोझ ढोने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए. गधी का दूध अपने खास पोषक तत्वों और बायोएक्टिव गुणों के कारण वैज्ञानिकों का ध्यान खींच रहा है.











Leave a comment