नई दिल्ली. भारत की समृद्ध पशु आनुवंशिक विविधता की पहचान और संरक्षण को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने 16 नई देशी नस्लों को मान्यता दी है. आईसीआर नई दिल्ली के उप महानिदेशक (पशु विज्ञान) डॉ. राघवेंद्र भट्ट की अध्यक्षता में नई दिल्ली में आयोजित ‘नस्ल पंजीकरण समिति’ की 14वीं बैठक में पशुधन और कुत्तों की नस्लों के पंजीकरण की सिफारिश की गई. इससे दस्तावेजीकरण और समृद्ध होगा और बिना पहचान वाली आनुवंशिक संपदा को कम करने में मदद मिलेगी.
भारत में पशुधन और पोल्ट्री नस्लों के पंजीकरण के लिए नोडल संस्थान, ICAR-NBAGR (करनाल) ने नई पंजीकृत नस्लों के लिए विशिष्ट ‘एक्सेशन नंबर’ (पहचान संख्या) आवंटित किए हैं.
इन नस्लों को मिली मान्यता
नई पंजीकृत नस्लों में उमर्दा, पेरियार, कोप्पल और महाकौशली मवेशी, गोमंचली भैंस, मडग्याल, सीमांचली, कोव देबार और असोमी भेड़, तोतापुरी और बत्तीसी बकरी, कोंबाई कुत्ता, नागल सुअर, कश्मीरी टट्टू, ब्रज गधा और सिक्किमी याक शामिल हैं.
इन नस्लों में 9 प्रजातियां शामिल हैं और ये 13 राज्यों तथा एक केंद्र शासित प्रदेश से संबंधित हैं.
ICAR-NBAGR द्वारा पंजीकृत नस्लों की कुल संख्या अब 262 हो गई है, जिसमें 258 देशी और 4 सिंथेटिक नस्लें शामिल हैं.
इन नस्लों का पंजीकरण भारत की देशी पशु आनुवंशिक विविधता को बनाए रखने में पशुपालकों, ब्रीडर्स, राज्य पशुपालन विभागों, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के महत्वपूर्ण योगदान को उजागर करता है.
आपकी जानकारी केे लिए बता दें कि पशुओं की देशी नस्लों को मान्यता देने से उनकी आनुवंशिक विविधता का संरक्षण होता है.
इस तरह की मान्यता उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान करती है और जैव चोरी (biopiracy) को रोकती है.
जानकारों का कहना है कि इससे सरकार को विशेष नस्लों के विकास, जनगणना और पशुपालकों के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाने में मदद मिलती है.
इसके अन्य फायदों की बात की जाए तो स्थानीय संक्रमणों और कीटों का सामना करने में सक्षम बनाने में मददद मिलती है.
लागत कम होती है. विदेशी नस्लों की तुलना में रखरखाव का खर्च बेहद कम होता है जब सरकार मान्यता देती है तो पशुपालक नस्लों को पालने के प्रेरित होते हैं.
वहीं एक्स्पर्ट का कहना है कि देशी डेयरी नस्लों दूध (विशेषकर A2 बीटा-केसीन युक्त) स्वास्थ्य के लिए ज्यादा गुणकारी होता है.










