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Animal Fodder: इस साल डेयरी किसानों के लिए चुनौती बन गया है पशु चारे पर आने वाला खर्च

चारे की फसल उगाने का एक खास समय होता है, जोकि अलग-अलग चारे के लिए अलग-अलग है.
प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली. भारत में दूध उत्पादन की कुल लागत का 60–70 फीसद हिस्सा चारे (feed) पर खर्च होता है. 2026 में, लागत का यह सबसे बड़ा हिस्सा पूरे देश के डेयरी किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. ऊर्जा और प्रोटीन देने वाले मुख्य घटकों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी ने किसानों के मुनाफे को कम कर दिया है, जबकि उसी अनुपात में दूध की कीमतें नहीं बढ़ी हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिए तो यह स्थिति और भी कठिन हो गई है. एक्सपर्ट कहते हैं कि कई कारणों से चारे के मुख्य घटकों की उपलब्धता कम हो गई है और वे महंगे हो गए हैं.

इसमें सरकार के E20 इथेनॉल-ब्लेंडिंग कार्यक्रम के कारण मक्के की मांग बढ़ गई है, जिससे इसकी कीमतें ऊपर चली गई हैं और ईंधन तथा चारे के बीच सीधा मुकाबला पैदा हो गया है. इसी बाजार दबाव का असर टूटे हुए चावल (broken rice) पर भी पड़ा है. कभी ऊर्जा का एक सस्ता स्रोत माना जाने वाला टूटा हुआ चावल, अब कीमतों में समानता (price parity) के कारण लगभग पहुंच से बाहर हो गया है.

इस वजह से चारे की पोषण गुणवत्ता पर पड़ सकता है असर
इसी तरह, गेहूं भी अब अधिकांश प्रकार के चारे (feed formulations) के लिए आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं रहा है.

इसके अलावा, जिन घटकों में अक्सर एफलाटॉक्सिन (aflatoxin) की मात्रा अधिक होती है.

उन्हें गुणवत्ता और सुरक्षा के आधार पर इस्तेमाल होने वाली सामग्री की सूची से पहले ही हटा दिया गया है.

इस साल एक खास बात यह देखने को मिली है कि राइस ब्रान एक्सट्रैक्शन (RBE) की कीमतें मक्के के बराबर पहुंच गई हैं, जो सामान्य बाजार स्थितियों में लगभग अकल्पनीय है.

उद्योग से जुड़े कई पेशेवरों के करियर में पहली बार ऐसा हुआ है कि RBE को मक्के के मुकाबले मिलने वाला पारंपरिक लागत लाभ खत्म हो गया है.

इस वजह से कई छोटी फीड मिलों को अपने चारे के मिश्रण में RBE की मात्रा काफी कम करनी पड़ी है.

जिससे उनके द्वारा तैयार चारे की पोषण गुणवत्ता और एकरूपता पर असर पड़ सकता है.

मानसून की अनिश्चितता और जलवायु संबंधी दबावों के कारण हरे चारे की उपलब्धता भी कम हो गई है.

इससे भी बाजार से खरीदे जाने वाले कंसंट्रेट फीड (concentrate feed) पर निर्भरता और बढ़ गई है.

चारे की लागत बढ़ने से दूध उत्पादन से होने वाली शुद्ध आय सीधे तौर पर कम हो जाती है.

निष्कर्ष
एक्सपर्ट कहते हैं कि कई छोटे किसान चारे की मात्रा या गुणवत्ता में कटौती कर रहे हैं, जिससे समय के साथ दूध का उत्पादन घट सकता है और पशुओं के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ सकता है.

Written by
Livestock Animal News Team

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