नई दिल्ली. एनिमल एक्सपर्ट का कहना है कि सेक्स्ड सार्टेड सीमन प्रक्रिया की वजह से गाय और भैसों से होने वाले बच्चे में बछिया के जन्म की संभावना तकरीबन 90 फीसदी हो जाती है. इस वजह से पशुपालन के जरिए डेयरी का बिजनेस करने वालों के लिए ये तरीका बेहद ही बढ़िया है और लोग इसका इस्तेमाल भी कर रहे हैं. क्योंकि पशुओं में प्रजनन को लेकर समस्याएं आना कोई नई बात नहीं है. जबकि दूसरी ओर ये तरीका इतना बेहतरीन है कि न सिर्फ बच्चे, बल्कि बछिया होने की संभावना भी बढ़ जाती है.
यही वजह है कि सरकारें भी इसको बढ़ावा देने का काम कर रही हैं. ताकि ज्यादा से ज्यादा ऐसे पशु मिल सकें जो दूध उत्पादन करें और दूध उत्पादन के मामले में देश की पहली पोजिशन की स्थिति को और ज्यादा मजबूत कर ले. जान लें कि सेक्स्ड सार्टेड सीमन की हर एक स्ट्रा पशुपालकों के लिये 100 रुपये में मिल जाती है. इसका प्रोडक्शन और स्टोरेज केन्द्रीय वीर्य संस्थान, भदभदा भोपाल में किया जाता है.
दूध उत्पादन बढ़ता है
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ज्यादातर बछिया पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है अधिक संख्या में जब बछिया होती है तो आगे चलकर दूध उत्पादन बढ़ता है.
दूध उत्पादन कर इसको बेचने वाले पशुपालकों के लिए ज्यादा संख्या में बछिया का पैदा होना बहुत ही फायदेमंद सौदा है. क्योंकि इससे उनकी इनकम अचानक से बढ़ सकती है.
जब ज्यादा दूध देने वाले पशु बाड़े में होंगे तो दूध का ज्यादा उत्पादन होगा. नतीजे में पशुपालन के काम में ज्यादा मुनाफा कमाने का मौका मिलेगा.
अच्छी बात यह भी यह किस तकनीक से उच्च गुणवत्ता वाली गाय और भैंसों की संख्या बढ़ जाती है. जिससे ज्यादा दूध देने वाले पशु मिलते हैं.
भारत भले ही नंबर वन दूध उत्पादक देश हो लेकिन प्रति पशु दूध उत्पादक क्षमता यहां के पशुओं की कम है. जिसे बढ़ाने के लिए ये तकनीक बेहतरीन साबित हो सकती है
सेक्स सॉर्टेड सीमेन तकनीक एक ऐसी जैविक तकनीक है, जिसमें पशुओं के सीमेन (वीर्य) में मौजूद X और Y क्रोमोसोम वाले शुक्राणुओं को अलग किया जाता है.
इसके बाद पशुपालक अपनी जरुरत के अनुसार बछड़ी या बछड़ा पैदा कर सकते हैं.
यह तकनीक पशुपालकों को यह तय करने में मदद करती है कि उन्हें बछड़ी चाहिए या बछड़ा.
इन बातों का रखें ख्याल
सेक्सड सार्टेड सीमन का इस्तेमाल उन दुधारु गायों और भैंसों पर करना चाहिए जिनका उच्च गर्भधारण दर हो व जिनका शरीर मजबूत हो.
सेक्स्ड सार्टेड सीमन का इस्तेमाल ऐसे स्थानों पर बेहतर रिजल्ट देता है जहां पर गायों और भैंसों में गर्मी के लक्षण मापने का कोई सिस्टम काम करता है.











