Home पशुपालन Animal Disease: पशुओं को इन 3 बीमारियों से होती है बेहद परेशानी, यहां पढ़ें लक्षण और इलाज का तरीका
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Animal Disease: पशुओं को इन 3 बीमारियों से होती है बेहद परेशानी, यहां पढ़ें लक्षण और इलाज का तरीका

गर्मियों में पशु बहुत जल्द बीमार होते हैं. अगर ठीक से इनकी देखरेख कर ली जाए तो हम पशुओं को बीमार होने से बचा सकते हैं.
प्रतीकात्मक फोटो.

नई दिल्ली. पशुपालन में सबसे ज्यादा नुकसान पशुओं की बीमारी के कारण होता है. जब पशु बीमार हो जाते हैं तो वो दूध उत्पादन कम कर देते हैं. ऐसा इसलिए होता है कि पशुओं की सेहत खराब हो जाती है. पशु खाना-पीना छोड़ देते हैं. खाते भी हैं तो बहुत कम खाते हैं. इसका असर उनकी सेहत पर पड़ता है और दूध उत्पादन कम हो जाता है. जिसके चलते पशुपालकों को बेहद ही नुकसान का सामना करना पड़ता है. एक तो दूध कम होने से नुकसान होता है जबकि दवाएं आदि करने से घर स पैसा लगाना पड़ता है.

इसलिए जरूरी है कि पशुओं को बीमार न होने दिया जाए. इसके लिए ये किया जा सकता है कि पशुओं की समय-समय पर जांच कराई जाए. पशुओं में बीमारी से जुड़े कोई लक्षण दिखाई दें तो तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह से इलाज कराएं. यहां हम आपको तीन बीमारियों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो डेयरी पशुओं को होते हैं.

दस्त लगने की समस्या
अधिकतर यह रोग भी परजीवी या पेट में फ्लुक्स के कारण होता है. जिससे आंतों में सूजन आ जाती है. पेट या लिवर में या आंत में आंतरिक परजीवी पशु को कमजोर बनाता है. इसके चलते पशुओं को बेहद ही परेशानी का सामना करना पड़ता है. इसके इलाज के लिए Panacur 3 ग्राम की दो बोलत (बड़े पशु के लिए) या Fanzole DS 3 ग्राम की 2 बोतल खिलानी चाहिए. इससे जानवर आंतरिक परजीवी से मुक्त हो जाता है.

अफारा बीमारी
गैसीय ब्लोट इस रोग में पेट में गैस इकट्ठा हो जाती है. पशु का बायां पेट फूल जाता है, थपथपाने पर ड्रम की आवाज आती है. पशु बेचैनी महसूस करता है. यह रोग अचानक ऐसा चारा खिलाने के कारण होता है, जिसमें जहरीला पदार्थ मौजूद हो. पशु घास खाने के बाद यदि तत्काल पानी पी लेता है तो रूमन में और ज्यादा मात्रा में गैस बनती है जो कि पशु के लिए घातक हो सकता है. ऐसी स्थिति में तुरंत सरसों और तारपीन का तेल प्रत्येक 100-100 ग्राम दोनों मौखिक रूप से दें. लकड़ी का कोयला (कॉल एक्टिव दवाई) 1 लीटर पानी में 200 ग्राम मिलाकर पिलाना लाभदायक रहता है. Blotosil या Tyrel 100 ग्राम को भी पिलाया जा सकता है.

चिचड़ी संक्रमण
टिकस इन्फेस्टेशन टिकस (चिचड़ी), उपजमे और जूं मेन कारक है. जो पशु के शरीर से खून चूसते हैं और प्रोटोजोआ जनित रोगों को उत्पन्न करते हैं. चिचड़ी को पशु के शरीर में होने से रोकने के लिये 1 लीटर पानी में 2-5 बुटोक्स या एक्टोमीन डालकर, इस घोल को पशु के शरीर व पशु आवास, फर्श व दीवारों पर स्प्रे करने से बचाव होता है. भैंसों पर इस दवा का स्प्रे नहीं करना चाहिए क्योंकि भैंस में इस दवा से खुजली हो जाती है.

Written by
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