Home पशुपालन Cow Shelter Home: देश की इस गोशाला को मंदिर मानकर पूजते हैं लोग, श्रद्धालु लगाते हैं 108 परिक्रमा
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Cow Shelter Home: देश की इस गोशाला को मंदिर मानकर पूजते हैं लोग, श्रद्धालु लगाते हैं 108 परिक्रमा

गोवंश के गोबर से संरक्षण केंद्र में बड़ा प्लांट संचालित होता है, जिससे जनरेटर के माध्यम से बिजली बनाई जाती है.
गोशाला में बैठी गाय.

नई दिल्ली. सनातन धर्म के अनुयायी गाय को भगवान का दर्जा देते हैं. इस धर्म को मानने वाले लोग गायों की पूजा भी करते हैं. मध्य प्रदेश की खंडवा की एक गोशाला है जहां गायों को पूजा जाता है. कहने को तो यह गोशाला है, लेकिन श्रद्धालु मंदिर मानकर यहां पाले जा रहे गोवंश की ईश्वर की भांति नियमित रूप से पूजा कर रहे हैं. गोशाला का प्रबंधन देखने वालों का कहना है कि उन लोगों को कई श्रद्धालुओं ने बताया कि यहां आने के बाद उनकी मनोकामनाएं भी पूरी हो रही हैं. इसके चलते श्रद्धालु इन गोवंश की 108 बार पस्क्रिमा भी जरूर करते हैं. श्रद्धालुओं की मान्यता है कि गोमाता की परिक्रमा करने से उनके घर में सुख-समृद्धि, व्यवसाय में लाभकी प्राप्ति होती है.

भवानी माता मार्ग स्थित श्री गणेश गोशाला की स्थापना साल 1925 में हुई थी. तब गोशाला में 22 गोवंश थे. इनकी संख्या बढ़कर अब करीब 450 हो गई है. गोशाला की खासियत यह है कि यहां रखी गायों के लिए चार बड़े बाड़े बनाए गए हैं, हर बाड़े में 108 गायों का वास है.

परिक्रमा के लिए बनाए गए हैं पथ
गौशाला प्रबंधन के मुताबिक हरेक गोवंश में 33 करोड़ देवी देवताओं का वास होता है, हिंदू धर्म में 108 का भी काफी महत्व है. ऐसे में गोशाला में चार बाड़े बनाकर हर बाड़े में 108 गोवंश को रखा गया है. यही नहीं हर बाड़े को गोलाकार आकार दिया जाकर परिक्रमा पथ का भी निर्माण किया गया है. जहां सुबह से शाम तक कई गोवंश की 108 बार परिक्रमा लेते हैं. श्रद्धालु गोशाला प्रबंधन के मुताबिक वैसे तो प्रदेशभर में सैकड़ों गोशाला है लेकिन खंडवा शहर की यह एकमात्र गोशाला है जहां 108 गोवंश के लिए परिक्रमा पथ बनाए गए हैं. प्रबंधन का दावा है कि प्रदेश में कहीं भी 108 गोवंश की परिक्रमा व उनकी परिक्रमा के लिए मार्ग नहीं है.

दिन में तीन बार होती है नंदी की मालिश
तत्कालीन महापौर ताराचंद अग्रवाल ने इसका निर्माण करवाया था. गोशाला के सचिव रामचंद्र मौर्य ने बताया गोशाला में प्रतिदिन आधी से पौन ट्रॉली गोबर निकलता है. जिसका उपयोग खाद बनाने के लिए होता है. वहीं गोशाला में मौजूद नंदी की भी अहमियत गोवंश से कम नहीं है. प्रबंधन ने बताया कि बैतूल से 6 साल पहले आए नंदी का नाम गोशाला में कालू रखा गया था. इसकी खासियत ये है कि गर्मी में हर दिन यह नहाता है, सालभर हर दिन इसकी तीन बार मालिश होती है. इसके बाद जमीन पर बैठता व आराम करता है.

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