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शैवाल की खेती से बढ़ेंगे रोगाजार के अवसर, जानिए कम खर्च में खेती करने का बहुत ही आसान सा तरीका

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प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली. शैवाल क्या है, ये कहां पैदा होती और इसका प्रयोग कैसे और किस-किस में किया जाता है. इस तरह के कई साल हमारे जहन में आते हैं. सबसे पहले तो बहुत से लोग यही नहीं जानते कि शैवाल होती क्या और इसका मानव जीवन में महत्व है, तो हम आज आपको बताते हैं कि शैवाल क्या है और इसका मानव जीवन में कितना महत्व् है. देश में बढ़ रहे बेरोजगारी के संकट को दूर करने और पर्यावरण के संकट से निपटने के लिए शैवाल की खेती काफी लाभदायक साबित हो सकती है. ओडिशा में स्थिति एशिया की खारे पानी की सबसे बड़ी झील में समुद्री शैवाल पर शोध कर रहे एक वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. दीनबंधु साहू ने कहा कि इसकी खेती के कई फायदे होते हैं. किसानों की समस्या के साथ-साथ यह पर्यावरण की समस्या का भी समाधान कर सकती है.

खारे और मीठे पानी में भी उग सकती है शैवाल
शैवाल मुख्य रूप से जलीय पौधे हैं. अधिकाशंत समुद्र या नदी, झीलों में उगते हैं जिन्हें समुद्री वीड कहते हैं. शैवाल की बहुत सी जातियां स्वच्छ पानी में भी उगती हैं, जैसे-नदी, झील, तालाब, पोखर व पानी से भरे हुए गड्ढे आदि. इस प्रकार के शैवालों को स्वच्छ जलीय शैवाल कहते हैं. कुछ शैवाल गीली मिट्टी, पुरानी दीवारों, वृक्षों की छाल, चट्टानों तथा लकड़ी के लट्ठों पर भी उगते हुए दिखाई देते हैं.

क्या है इंडियन सी वीड्स व्हील
दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर दीनबंधु साहू ने बताया कि देश में शैवाल की खेती को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अशोक चक्र के समान एक पहिया डिजाइन किया है जिसे “इंडियन सी वीड्स व्हील” कहा जाता है. इसकी खासियत यह है कि इसमें अशोक चक्र की तरह की 24 तीलीयां लगीं हुई हैं साथ ही इसका व्यास 24 फुट का है.

चक्र के तीलियों में शैवाल के पौधों को बांधा जाता है
वरिष्ठ प्रोफेसर दीनबंधु साहू एशिया की खारे पानी की सबसे बड़ी झील चिल्का झील में शैवाल की ग्रासिलारिया प्रजाति पर काम कर रहे हैं. इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अब तक करीन 100 लोगों को शैवाल की खेती करने का प्रशिक्षण दिया है. एक मीडिया हाउस को बताते हुए उन्होंने कहा कि जिस अशोक चक्र को उन्होंने शैवाल की खेती के लिए डिजाइन किया है, उसके जरिए शैवाल की खेती करना आसान हो गया है. इस नई तकनीक में चक्र के तीलियों में शैवाल के पौधों को बांधा जाता है. फिर इसे कमर तक या इससे अपर के पानी में उतरकर तालाब में डुबाया जाता है. इसके बाद इसे 45 दिनों तक अंदर छोड़ दिया जाता है.

45 दिनों में एक किलोग्राम का हो जाता है पौधा
दीनबंधु साहू ने बताया कि शैवाल की खेती में जबरदस्त उत्पादन होता है. 59 ग्राम का पौधा लगाने पर 45 दिनों में यह एक किलोग्राम का हो जाता है. जबकि इसकी खेती में दवाई या खाद का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. दीनबंधु साहू बताते हैं कि समुद्री शैवाल की खेती को बढ़ावा देने से न सिर्फ तटों के आसपास रहने वाले लोगों के लिए रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे बल्कि यह भविष्य में जैविक खाद और बायोएथेनॉल की जरूरतों को पूरा करने में भी मददगार साबित हो सकता है. उनका कहना है कि शैवाल की खेती जलवायु परिवर्तन को रोकने में भी कारगर साबित हो सकती है क्योंकि शैवाल एक पेड़ की तुलना में प्रति हेक्टेयर चार गुणा ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करता है.

किस-किस तरीके से किया जाता है शैवाल का इस्तेमाल
शैवार की कमर्शियल वैल्यू का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि समुद्री शैवाल का उपयोग भोजन, मवेशियों के चारे, जैव उर्वरक और जैव ईंधन के स्रोत के रूप में किया जाता है. इसके साथ ही टूथ पेस्ट, आइसक्रीम, टमाटर केचप, चॉकलेट, कपड़ा छपाई, जैव प्लास्टिक और कागज निर्माण आदि में भी किया जाता है. प्रो साहू का कहना है कि शैवाल की खेती करने से रोज़गार बढ़ेगा. हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जबतक शैवाल से जुड़े उद्योग सामने नहीं आएंगे तब तक बड़ै पैमाने पर इसका उत्पादन नहीं हो सकेगा. इसकी खेती की संभावनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में 7500 किलोमीटर की समुद्री तटरेखा है. जो इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए काफी है.

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