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Milk Production: दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए गिर और साहीवाल नस्लों को बढ़ावा देगी एमपी सरकार

नई दिल्ली. मध्य प्रदेश में पड़ोसी राज्य गुजरात की गिर नस्ल की गाय किसानों और पशुपालकों के लिए कामधेनु बनेंगी. इसके लिए एमपी में गोवंश के नस्ल सुधार के लिए सबसे बड़ा अभियान शुरू किया गया है. बता दें कि मध्य प्रदेश में गोवंश की ऐसी अभी कोई परंपरागत नस्ल नहीं है, जो दूध उत्पादन और खेती दोनों के साथ मौसम की विपरीत परिस्थियों जैसे तेज गर्मी, बारिश और सर्दी को झेल सके. ऐसे में अब एमपी में कृत्रिम गर्भाधान (एआई) के लिए पड़ोसी राज्य गुजरात की प्रजाति पर ही सबसे अधिक भरोसा किया जा रहा है.

इसके अलावा परंपरागत रूप से पाकिस्तानी नस्ल साहीवाल जो अब हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में बड़ी संख्या में मिलती है की नस्ल को भी अपनाया जा रहा है. बता दें कि मालवी, निमाड़ी, केनकाथा और गौलाओ देसी गोवंश के मुख्य ब्रीड हैं. इनमें से कुछ स्थानीय वातावरण में ढले हुए हैं लेकिन उनसे दुग्ध उत्पादन कम होता है.

बढ़ावा देने की क्या है वजह
इसके अलावा इनमें रोग प्रतिरोधक क्षमताएं भी कम होती हैं. इसी कारण प्रदेश के पशुपालन विभाग ने गिर और साहीवाल नस्लों को बढ़ावा देने की मुहिम शुरू की है.

सरकार ने हिरण्य गभां नाम के इस अभियान में वेटनरी के 8000 प्रशिक्षित स्टाफ और सहयोगियों को फील्ड में उतारा है, जो पशुपालकों और किसानों को देसी ब्रीड का कृत्रिम गर्भाधान गिर या साहीवाल की नस्ल से कराने की सलाह दे रहे हैं.

अभियान में प्रदेश के 12 लाख पशुपालक परिवारों के सवा करोड़ लोगों तक वेटनरी स्टाफ पहुंच चुका है और एआई के जरिए इन देसी नस्लों को गिर और साहीवाल की एडवांस ब्रीड में बदला जा रहा है.

वित्त वर्ष (2025-26) के दौरान गोवंश की नस्ल सुधार के लिए पशुपालन विभाग दो मोचों पर काम कर रहा है.

इसमें पहला सेक्सड सार्टेड तकनीक है. इससे प्रदेश के 1.51 लाख से अधिक पशुओं का गर्भाधान किया जा चुका है.

एक्सपर्ट के अनुसार इस तकनीक का फायदा यह है कि इसमें बछिया पैदा होने की संभावना 40 प्रतिशत से भी अधिक होती है.

इससे भविष्य में दूध उत्पादन में क्रांतिकारी बढ़ोतरी होना तय है. इसके अलावा प्रदेश के दूर-दराज के इलाकों में 14.41 लाख से अधिक पशुओं का पारंपरिक कृत्रिम गर्भाधान किया गया है. ताकि हर गांव तक उन्नत नस्ल की पहुंच सुनिश्चित हो सके.

इसके अलावा किसानों और पशुपालकों को नस्ल सुधार के लिए राजी करने में विभाग ने 8000 से ज्यादा प्रशिक्षित वर्कर्स की फोर्स मैदान में उतारी है.

गिर और साहीवाल नस्ल की खूबियां
पशुपालन के लिए गिर और साहीवाल नस्ल की गायों को भारतीय परिस्थिति में बेहतर माना जाता है.

ये न केवल अपनी उच्च दूध उत्पादन क्षमता के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि प्रतिकूल जलवायु में भी खुद को ढालने की ताकत रखती हैं.

गिर गाय मूल रूप से गुजरात के गिर जंगलों से आने वाली नस्ल है, जिसे सौराष्ट्र की शान कहा जाता है. इस नस्ल को ब्राजील समेत कई अन्य देश भी अपना चुके हैं.

गिर गाय एक सीजन में औसतन 2000 से 2500 लीटर तक दूध दे सकती है इस नस्ल में रोगों और परजीवियों से लड़ने की शक्ति होती है.

ये शांत स्वभाव की होती हैं और इन्हें पालना काफी आसान होता है. इसके अलावा साहीवाल गाय को भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे अच्छी दुधारू नस्ल माना जाता है.

साहीवाल के दूध में वसा की मात्रा अधिक होती है और इसमें 2 बीटा-केसीन प्रोटीन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है.

जो स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद है. साहीवाल गायें कम चारे और विपरीत मौसम में भी अच्छा उत्पादन देने के लिए जानी जाती हैं.

निष्कर्ष
प्रदेश में गोवंश का नस्ल सुधार बड़ी चुनौती है. इससे दूध उत्पादन बढ़ने के साथ पशुपालकों और किसानों की आय बढ़ेगी. 8000 से ज्यादा वर्कफोर्स इसमें दिन-रात जुटी है.

Written by
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