नई दिल्ली. राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के चेयरमैन डॉ. मीनेश शाह (Meenesh C Shah) ने गुजरात टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी (GTU) और नेचर फर्स्ट द्वारा आयोजित संगोष्ठी में सस्टेनेबिलिटी को भारतीय संस्कृति, सहकारी आंदोलन और आधुनिक विज्ञान से जोड़ते हुए एक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया. अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने डेयरी क्षेत्र को आजीविका, पोषण सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण स्तंभ बताया. उन्होंने कहा कि पशुपालन और कृषि परस्पर पूरक हैं और डेयरी क्षेत्र लैक्टो-वेजिटेरियन आबादी के लिए एनिमल प्रोटीन का प्रमुख स्रोत है.
उन्होंने यह भी कहा कि योजना के साथ कार्यक्रमों के कारण दूध उत्पादन बढ़ा है, जिससे प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है. डॉ. शाह ने सरदार वल्लभभाई पटेल के सहकारी विजन और लाल बहादुर शास्त्री से प्रेरित ऑपरेशन फ्लड को भारतीय डेयरी क्रांति की नींव बताया और इसका विशेष जिक्र किया.
बायोगैस और बायो-सीएनजी पहलों के बारे में भी बताया
अपने संबोधन में उन्होंने गोबर को एक मूल्यवान संसाधन बताते हुए उन्होंने जैविक उर्वरकों, केंद्रीकृत और विकेंद्रीकृत (decentralized) बायोगैस मॉडल और कार्बन क्रेडिट की अवधारणा को समझाया.
वाराणसी मिल्क यूनियन का केंद्रीकृत बायोगैस आधारित ऊर्जा उत्पादन मॉडल और Banas Dairy का बायो-सीएनजी परिवहन मॉडल इसके प्रमुख अनुकरणीय उदाहरण हैं.
एनडीडीबी की सहायक कंपनी एनडीडीबी मृदा लिमिटेड तथा सुजुकी आर एंड डी सेंटर इंडिया (SRDI) प्राइवेट लिमिटेड के साथ साझेदारी के माध्यम से संचालित गोबर आधारित बायोगैस और बायो-सीएनजी पहलों पर प्रकाश डाला.
उन्होंने बताया कि फीडस्टॉक अनुसंधान और चारा विकास जैसी तकनीकों ने डेयरी उत्पादकता को नई दिशा प्रदान की है.
इसके साथ ही उन्होंने एनडीडीबी द्वारा स्वदेशी तकनीक से विकसित सेक्स-सॉर्टेड सीमन और स्वदेशी जीनोमिक चिप की जानकारी देते हुए बताया कि इनका लोकार्पण माननीय प्रधानमंत्री द्वारा किया गया है.
उन्होंने Paris Agreement और United Nations के लगातार विकास लक्ष्यों के अनुरूप एनडीडीबी के प्रयासों को रेखांकित करते हुए जैविक उर्वरकों पर सरकारी सब्सिडी और सीएनजी में 2 फीसद सीबीजी मिश्रण नीति को भारत सरकार द्वारा लिया गया प्रगतिशील कदम बताया.
अंत में, उन्होंने शोधकर्ताओं एवं उद्यमियों से आह्वान किया कि वे डेयरी क्षेत्र, सर्कुलर बिज़नेस मॉडल और क्लाइमेट-फ्रेंडली इनोवेशन पर विशेष ध्यान केंद्रित करें.
उन्होंने जोर देकर कहा कि सस्टेनेबिलिटी और समृद्धि परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं.
सही नीतियों, तकनीक तथा सहकारी ढांचे के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सुदृढ़ किया जा सकता है.











