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Fish Farming: तालाब की मिट्टी की जांच में इन बातों का रखें ध्यान, फिश फार्मिंग से जुड़े फैक्ट्स को भी पढ़ें

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प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली. तालाब में मछली पालन के लिए पानी तथा मिट्टी की उपयोगिता का बहुत अहम रोल होता है. क्योंकि मिट्टी तथा पानी में उपलब्ध पोषक तत्वों का मछली तथा पानी की उत्पादकता निर्भर करती है. मिट्टी का नमूना हरेक 75 सेमी. गहराई से कम से कम 250 ग्राम लेना चाहिए. पानी का नमूना एक अच्छे तथा साफ बोतल में 1 लीटर लेना चाहिए. पानी का नमूना उसी दिन लेना चाहिए, जिस दिन उसे लेबोरेटरी में पहुंचाना हो. वहीं मछली पालक खुद भी इसकी जांच कर सकते हैं. हालांकि इसका तरीका पता होना बेहद ही जरूरी है.

एक्स्पर्ट कहते हैं खुद से मिट्टी की जांच करने के लिए तालाब के सतह से हाथ में थोड़ी मिट्टी लें इस मिट्टी को हाथ में गेंदाकार बना लें. इस गेंदाकार मिट्टी को हवा में उछाल कर गिरते क्रम में फिर पकड़ें. जिस मिट्टी में बालू या कंकड, ज्यादा होंगे वो आपस में नहीं चिपकेगी और उसे जैसे ही हवा में उछालेंगे तो ये टूटकर बिखर जाएगी. अगर मिट्टी का गेंद नहीं बिखरता है तो मिट्टी अच्छी और तालाब निर्माण के लिए उपयुक्त है.

तालाब बनाने के लिए ऐसे करें मिट्टी की जांच
आपकी जाानकारी के लिए बता दें कि तालाब निर्माण से पूर्व मिट्टी की एक और जांच कराना बेहद ही जरूरी है. इसके लिए दो फीट लम्बा, दो फीट चौड़ा एवं 3 फीट गहरा एक गड्‌ढा खोदें. इस गड्ढे में सुबह पानी भर दें और शाम को देखें एवं माप करें कि गड्‌ढे में कितना पानी बचा रह गया है. गड्ढे के पानी में आयी कमी आमतौर पर वाष्पीकरण तथा मिट्टी के अन्दर सोखने के कारण से होता है. फिर उस गड्‌ढे को पानी से भर दें. गड्ढ़े को चौड़े पत्तों वाले झाड़ से ढक दें. दूसरे दिन सुबह फिर देखें और पानी के स्तर को माप लें कि कितना पानी उस गड्ढे से बचा है. गड्ढे के पानी के जल स्तर में आयी कमी मिट्टी के अन्दर पानी के सोखने के कारण होती है. अगर ज्यादातर पानी गड्‌ढ़े में बाकी बचा है तो उस जमीन पर तालाब का निर्माण किया जा सकता है. बलुआई मिट्टी में पानी काफी तेजी से भागता है जबकि चिकनी दोमट मिट्टी में धीरे-धीरे.

इन अहम बातों को भी जान लें फिश फॉर्मर्स
वहीं मैदानी क्षेत्रों में जलीय तापमान मत्स्य पालन के लिए 20°C-35C अनुकूल होता है. ज्यादा तापमान से तालाब में मेटावोलाइट्स (उपायचयी पदार्थ) की अधिकता बढ़ जाती है तथा कम तापमान से मछली की ग्रोथ रुक जाती है. जबकि तालाब के पानी का रंग प्लैकटन के घनत्व को दर्शाता है. हरा और भूरा पानी का रंग बेहतर होता है. पानी यदि रंगहीन दिखाई दे तो इसका मतलब यह हुआ कि तालाब में प्लैंकटन की मात्रा बेहद कम है और अगर पानी गहरे हरा रंग का दिखाई दे तो यह तालाब में अलगल बलूम को दर्शाता है. वहीं तालाब के जल की पारदर्शिता 20 सेंटीमीटर से कम हो तो तालाब में पोषक तत्वों बहुत होते हैं. इसके विपरीत अगर पारदर्शिता 35-40 सेंटीमीटर से अधिक है तो यह जलीय उत्पादकता में आयी कमी को दर्शाता है. गंदलापन (टर्विडिटी) पानी की टर्बिडिट 30 पीपीएम से कम होनी चाहिए. इससे अधिक टर्बिसिटी मछलियों के गलफड़ों को नुकसान पहुंचा सकती है.

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