Home मछली पालन Fisheries: भारत ने ब्रिक्स समूह में मछली पालन-जलीय कृषि को किसानों की इनकम से जोड़ने का रखा प्रस्ताव
मछली पालन

Fisheries: भारत ने ब्रिक्स समूह में मछली पालन-जलीय कृषि को किसानों की इनकम से जोड़ने का रखा प्रस्ताव

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मछलियों की प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली. मत्स्य पालन, पशुपालन और दुग्ध उत्पादन मंत्रालय, भारत सरकार के मत्स्य पालन विभाग ने भारत की अध्यक्षता में पिछले दिनों वर्चुअली ब्रिक्स-कृषि कार्य समूह में मछली पालन और जलीय कृषि के विकास पर एक उच्च स्तरीय संवाद का आयोजन किया. जहां ये बताया गया कि ब्रिक्स देश सामूहिक रूप से वैश्विक जलीय कृषि उत्पादन में लगभग 70 फीसद और कुल मछली पालन में लगभग 30 फीसद का योगदान करते हैं जो वैश्विक जलीय खाद्य प्रणालियों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है. इस दौरान खासकर भारत का नेतृत्व करने वाले ​अफसरों ने इसमें बढ़ोत्तरी करने और इसे इनकम से जोड़ने पर जोर दिया.

इसमें हैचरी और प्रजनन प्रणालियों में प्रौद्योगिकी, ज्ञान और सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान, आनुवंशिक सुधार कार्यक्रमों का कार्यान्वयन, गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना और समुद्री शैवाल की खेती और जर्मप्लाज्म विकास को बढ़ावा देना सहित सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों पर चर्चा की गई. सागर मेहरा, संयुक्त सचिव, अंतर्देशीय मत्स्य पालन ने बताया कि जहाँ एक ओर मत्स्य पालन वैश्विक विकास के प्रमुख कारक बनकर में उभर रहा है, वहीं यह क्षेत्र दूसरी ओर जलवायु परिवर्तनशीलता, जैव सुरक्षा जोखिम और बाजार की अस्थिरता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है.

इनकम बढ़ाने के लिए क्या करना होगा
उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों के समाधान के लिए ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच समन्वित और प्रौद्योगिकी-आधारित उपायों की आवश्यकता है.

उन्होंने मछली पालन क्षेत्र में उत्पादकता, स्थिरता और आजीविका को बढ़ावा देने के लिए किसान-केंद्रित दृष्टिकोण, डिजिटल परिवर्तन और मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करने के महत्व पर भी बल दिया.

भारत के लिए एफएओ के देश प्रतिनिधि श्री ताकायुकी हागिवारा ने ब्लू ट्रांसफॉर्मेशन एजेंडा के अनुरूप तकनीकी सहयोग, नवाचार और ज्ञान के आदान-प्रदान के माध्यम से मत्स्य पालन को बढ़ावा देने में एफएओ की भूमिका के बारे में बताया.

उन्होंने सतत विकास, समावेशी विकास और मूल्यवर्धन एवं उद्यमिता के माध्यम से महिलाओं और युवाओं को सशक्त बनाने पर बल दिया.

साथ ही लचीली जलीय कृषि, मछली पकड़ने और नीली अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में ब्रिक्स देशों को सहयोग देने की एफएओ की प्रतिबद्धता दोहराई.

डॉ. जॉयकृष्ण जेना, उप महानिदेशक (मत्स्य विज्ञान), आईसीएआर ने आईसीएआर द्वारा किए गए अनुसंधान, प्रजाति विविधीकरण, जीनोमिक्स और जीनोम संपादन, आनुवंशिक सुधार कार्यक्रम और विस्तार सेवाओं पर जोर दिया.

उन्होंने गुणवत्ता और सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करते हुए “सभी के लिए मछली” के दृष्टिकोण के बारे में बताया और रोग, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा आवश्यकताएं, बाजार की अस्थिरता और चारा संबंधी बाधाओं जैसी प्रमुख चुनौतियों का जिक्र किया.

डॉ. पी. कृष्णन (बीओबीपी-आईएजीओ) ने ग्लोबल साउथ के लिए विस्तारित ब्रिक्स मंच के रणनीतिक महत्व पर जोर दिया क्योंकि वहां के उपभोक्ता बाजार विशाल हैं और पोषण एवं आजीविका के लिए मत्स्य पालन पर उनकी निर्भरता बहुत अधिक है.

उन्होंने पश्चिमी प्रमाणन प्रणालियों पर निर्भरता कम करने के लिए एक अंतर-ब्रिक्स व्यापार मंच का प्रस्ताव रखा और बंगाल की खाड़ी को सुरक्षा, डिजिटल कैच सिस्टम और क्षमता विकास का केंद्र बताया.

भारत के सागर मेहरा ने इस बात पर जोर दिया कि भारत सहयोग, नवाचार, व्यापार और जलवायु अनुकूलन के माध्यम से किसान-केंद्रित और सतत् मत्स्य पालन विकास को बढ़ावा दे रहा है.

साथ ही मत्स्य पालन और जलीय कृषि क्षेत्र में अपनी मजबूत पहलों को प्रदर्शित कर रहा है जिनमें बड़ा निवेश, आधुनिक बुनियादी ढांचा, डिजिटल परिवर्तन और समावेशी आजीविका सहायता शामिल हैं.

उन्होंने पारिस्थितिक स्थिरता, सामाजिक समानता और आर्थिक व्यवहार्यता के महत्व के बारे में बताया साथ ही छोटे मछुआरों को सशक्त बनाने, महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देने की बात कही.

साथ ही टेक्नोलॉजी (जैसे एआई, ड्रोन और उपग्रह निगरानी) को अपनाने और उत्पादन, निर्यात और वैश्विक खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए लचीली मूल्य श्रृंखलाओं के निर्माण पर भी बल दिया.

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