नई दिल्ली. बिहार सरकार के पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग की ओर से बताया गया है कि नवंबर के महीने में मछली पालकों को किन बातों पर ध्यान देना चाहिए. यादि आप भी मछली पालक हैं, तो ये जानना आपके लिए बेहद जरूरी है कि नवंबर के महीने में तालाब में मछलियों के लिए पूरक आहार का इस्तेमाल कुल मछलियों के शरीर के भार से 1 से 2 प्रतिशत की दर से ज्यादा नहीं करना चाहिए. वहीं तालाब के पानी की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए 400 ग्राम प्रति एकड़ की दर से जलीय प्रोबायोटिक्स का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए.
मछली पालन के एक्सपर्ट का कहना है कि तालाब की मिट्टी की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए 400 ग्राम प्रति एकड़ की दर से मृदा प्रोबायोटिक्स का इस्तेमाल करें और इसके अलावा 10 किलो ग्राम प्रति एकड़ की दर से जियोलाईट का प्रयोग नमी युक्त बालू में मिला कर करें.
इन बातों का भी रखें ध्यप
तालाब में जलीय खर-पतवार होने पर रासायनिक उर्वरक तथा सिंगल सुपर फासस्फेट का इस्तेमाल करना चाहिए.
कार्प मछलियों वाले तालाब में इस महीने के आखिरी में जाल जरूर चलाना या फिर चलवाना चाहिए.
पंगेशियस मछलियों वाले तालाब से तैयार मछलियों को निकालने का काम नवम्बर तक जरूर कर लें. क्योंकि तापमान के गिरने से पंगेशियस मछलियों के मरने की संभावनायें बढ़ जाती है.
यदि पंगेशियस मछली छोटी है (बिक्री योग्य नहीं है) तो ठंड से बचाने के लिए तालाब की पानी की गहराई 8 से 10 फिट रखना चाहिए.
वहीं पूरे ठंड के मौसम तक रात्रि में बोरिंग का पानी तालाब के मध्य में तलहटी में डालना चाहिए एवं 8 से 10 फिट पानी का स्तर होने के बाद ऊपर से एक निकालने वाला पाईप लगा देना चाहिए.
पंगेशियस मछलियों वाले तालाब में तैयार मछली की निकासी का कार्य 3-4 दिनों के अन्दर लगातार कर लेना चाहिए क्योंकि बची हुई मछली को छोड़ने से मरने की संभावना बढ़ जाती है.
तालाब में चूना का प्रयोग 15 से 20 किलो ग्राम पी० एच० मान के अनुसार प्रति एकड़ की दर से 15 दिनों के गैप पर करें.
मछलियों को संक्रमण से बचाने के लिए प्रति एकड़ 400 ग्राम पोटाशियम परमेग्नेट प्रति एकड़ की दर से वाटर सेनिटाईजर का प्रयोग करें.
तालाब का पानी ज्यादा हरा होने पर चूना एवं रासायनिक खाद का प्रयोग बंद कर दें एवं 800 ग्राम प्रति एकड की दर से कॉपर सल्सफेट का प्रयोग पानी में घोलकर करें.










