नई दिल्ली. जैसे-जैसे जलीय कृषि का विस्तार नए फार्मों के माध्यम से हो रहा है, वैसे-वैसे ये क्षेत्र कई प्रकार के जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील हो रहा है. रोगों का प्रकोप, गर्मियों में होने वाली ऐसी मछली उत्पादन क्षति जिसे रोका नहीं जा सकता है. वहीं प्रदूषण, भूकंप, चक्रवात, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाएं भी ऐसे बार-बार आने वाले जोखिम हैं, जो निवेश को पूरी तरह प्रभावित कर सकते हैं. इन जोखिमों का छोटे और सीमांत किसानों पर वित्तीय प्रभाव गंभीर होता है. ज्यादातर किसान सीमित लाभ मार्जिन पर कार्य करते हैं और ऊंची ब्याज दरों पर अनौपचारिक ऋण पर निर्भर रहते हैं.
एक फसल चक्र के विफल होने से किसान को केवल तत्काल आर्थिक नुकसान ही नहीं होता, बल्कि वह ऐसे ऋण-जाल में भी फंस सकता है, जिससे बाहर निकलने में कई वर्ष लग सकते हैं. इन व्यक्तिगत नुकसान का सामूहिक प्रभाव क्षेत्र की विकास क्षमता को सीमित करता है, निवेश को हतोत्साहित करता है और उन किसानों की विस्तार संबंधी महत्वाकांक्षाओं को प्रभावित करता है, जो अन्यथा अपने उत्पादन का विस्तार कर सकते हैं. इसलिए जोखिम कम करने का आर्थिक आधार केवल किसान कल्याण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की उत्पादकता और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा हुआ है.
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वहीं उपलब्ध जोखिम प्रबंधन साधनों में बीमा की विशिष्ट भूमिका है. बीमा नुकसान को रोकता नहीं है, लेकिन यह किसानों को वित्तीय संकट से सुरक्षा प्रदान करता है. साथ ही उन्हें उत्पादन जारी रखने की क्षमता तथा लचीलापन प्रदान करता है.
इसी को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने 8 फरवरी 2024 को प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना को मंजूरी दी गई थी.
इस उप-योजना के घटक 1-बी के अंतर्गत जलीय कृषि बीमा को अपनाने के लिए प्रोत्साहन का प्रावधान किया गया है.
इसके तहत लाभ राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफॉर्म (एनएफडीपी) के माध्यम से प्रदान किए जाते हैं, जिससे किसानों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के जरिए सीधे लाभ पहुंचाया जा सके.
प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना के तहत जलीय कृषि बीमा की पहल का उद्देश्य बीमा की वहनीयता से जुड़ी प्रमुख चुनौती का समाधान करना है.
इसके अंतर्गत जलीय कृषि किसानों को एक फसल चक्र के लिए जलीय कृषि बीमा पॉलिसी खरीदने पर डीबीटी के माध्यम से एकमुश्त मौद्रिक प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है.
योजना के तहत पात्र लाभार्थियों को बीमा प्रीमियम की लागत का 40 प्रतिशत तक प्रोत्साहन दिया जाता है.
तालाब जलीय कृषि के लिए यह प्रोत्साहन जल प्रसार क्षेत्र के प्रति हेक्टेयर अधिकतम 25,000 रुपये तक सीमित है.
वहीं अधिकतम एक लाख रुपये का प्रोत्साहन 4 हेक्टेयर तक के क्षेत्र के लिए उपलब्ध है.
एक हेक्टेयर से कम क्षेत्र वाले फार्मों के लिए प्रोत्साहन आनुपातिक आधार पर प्रदान किया जाता है.
केज कल्चर, पुनर्चक्रण मत्स्य पालन प्रणाली (आरएएस), बायोफ्लॉक, रेसवे तथा इसी प्रकार की उन्नत जलीय कृषि प्रणालियों के लिए बीमा प्रीमियम का 40 प्रतिशत प्रोत्साहन दिया जाता है.
इसके तहत अधिकतम प्रोत्साहन 1,00,000 रुपये और पात्र इकाई का अधिकतम आकार 1,800 घन मीटर निर्धारित किया गया है.
इसके अतिरिक्त, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला लाभार्थियों को सामान्य श्रेणी के लिए देय प्रोत्साहन के अतिरिक्त 10 प्रतिशत की दर से अतिरिक्त प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है.











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