नई दिल्ली. पशुओं की नई नस्लों को मान्यता देने वाली संस्था नेशनल ब्यूरो ऑफ एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज (NBAGR) ने कई और पशुओं की नस्ल को मान्यता दी है. जिसमें से गाय, बकरी और भेड़ तक शामिल है. गरीबों की गाय कही जाने वाली बकरी की भी दो नई नस्ल को मान्यता दी गई है. इस तरह बकरी की अब कुल 37 नस्लों को मान्यता मिल चुकी है. बता दें कि नेशनल ब्यूरो ऑफ एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज की ओर से दो नई नस्ल पलामू और उदयपुरी को शामिल किया गया है. पलामू झारखंड राज्य और उदयपुरी उत्तराखंड की है.
एनबीएजीआर की तरफ से जिन दोनों नस्लों की बकरियों को मान्यता दी गई है. ये दोनों ही मीट उत्पादन के लिए अच्छी नस्ल मानी जाती हैं. यदि बकरी पालक भाई मीट उत्पादन के लिए इसका पालन करते हैं तो फिर उन्हें अच्छा मुनाफा मिल सकता है. बता दें कि पलामू की संख्या तो ज्यादा है लेकिन उदयपुरी की कम है. आइए डिटेल में जानते हैं दोनों नस्लों की क्या खासियत है.
पलामू बकरी के बारे में पढ़ें यहां
ये बकरियां झारखंड के पलामू, लातेहार और गढ़वा जिलों में पाई जाती हैं. पलामू बकरियां दिखने में लंबी होती हैं, इनका शरीर बेलनाकार और आकार मध्यम होता है.
इनके शरीर का रंग ज्यादातर गहरा भूरा से काला होता है. कान लटके हुए होते हैं. इस नस्ल का इस्तेमाल मुख्य रूप से मांस के लिए किया जाता है.
वयस्क नर का वजन 26 से 34 किलोग्राम और वयस्क मादा का वजन 19 से 28 किलोग्राम होता है.
ये जानवर इस क्षेत्र की कृषि-पारिस्थितिक स्थितियों के लिए अच्छी तरह से अनुकूलित हैं और मुख्य रूप से चराई पर पाले जाते हैं.
किसान इनकी मजबूती और व्यावसायिक लाभ के कारण इन बकरियों को पसंद करते हैं. पलामू बकरी की अनुमानित आबादी लगभग 5.7 लाख है.
उदयपुरी बकरी की क्या है खासियत
इन बकरियों का मूल स्थान उत्तराखंड का पौड़ी गढ़वाल है. उदयपुरी बकरियां मीडियम साइज की होती हैं, जिनका शरीर कॉम्पैक्ट और बाल घने होते हैं.
टैन रंग के कोट पर ऊपर की तरफ काली धारी होती है. सिर थोड़ा उभरा हुआ होता है. माथे पर काले बाल होते हैं.
कान लटके हुए होते हैं और दाढ़ी नहीं होती है. सींग मीडियम साइज के चपटे आकार के नुकीले और बाहर या फिर पीछे की ओर मुड़े हुए होते हैं.
इनका मुख्य रूप से मांस के लिए इस्तेमाल किया जाता है. वयस्क नर का औसत शारीरिक वजन 26 किलो ग्राम तक होता है. इनकी आबादी लगभग 25 हजार है.











