Home पोल्ट्री बर्ड फ्लू के खतरे को खत्म कर देगा बूस्टर डोज, पोल्ट्री कारोबारियों के लिए रामबाण है ये
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बर्ड फ्लू के खतरे को खत्म कर देगा बूस्टर डोज, पोल्ट्री कारोबारियों के लिए रामबाण है ये

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प्रतीकात्मक फोटो:

नई दिल्ली. बर्ड फ्लू एक ऐसी बीमारी है, जिसकी चर्चा भर से ही देशभर में पोल्ट्री फार्मर की रातों की नींद उड़ जाती है. पोल्ट्री के धंधे से जुड़े हजारों कारोबारियों का भारी नुकसान उठाना पड़ जाता है. ऐसे में कोई भी कारोबारी नहीं चाहता कि बर्ड फ्लू से उसे नुकसान हो. हालांकि अब राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान भोपाल बर्ड फ्लू से लड़ने के लिए लो पैथोजिन की वैक्सीन को तैयार कर लिया है और इसे बाजार में भी उतार दिया है लेकिन एक्सपर्ट का मानना है कि सिर्फ इतना भर से काम नहीं चलने वाला है. इसके लिए हाई पैथोजिन की वक्सीन की भी जरूरत है.

क्योंकि अक्सर मुर्गियों में एवियन इनफ्लुएंजा हो जाता है, तब हाई पैथोजिन की वक्सीन ही मुर्गियों को बचाने में कारगर साबित हो सकी है. ऐसा न होने पर मुर्गियों को दफनाने के आवाला कोई दूसरा चारा नहीं होगा. बता दें कि बर्ड फ्लू पर काबू पाने के लिए वैक्सीन तैयार करके बाजार में भी उतार दिया है. गौरतलब है कि दिल्ली में हुए कार्यक्रम के दौरान वैक्सीन की तकनीक प्राइवेट कंपनी को भी दी जा चुकी है. जल्द ही लो पैथोजिन की वैक्सीन बाजार में उपलब्ध होगी.

पोल्ट्री एक्सपर्ट का ऐसा मानना है कि ज्यादातर मुर्गियों में N9 और N2 के लो पैथोजन का असर देखा जाता है. लो पैथोजन से पीड़ित मुर्गी की पहचान ये है कि वे 50 से 60 फ़ीसदी तक अंडा देना कम कर देती हैं. मुर्गियों में सांस की बीमारी हो जाती है. 7 से 8 फ़ीसदी तक मुर्गियां मरने लग जाती हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि अभी तक इस तरह के प्रभाव को रोकने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था. यानी वहां से वैक्सीन को मांगना पड़ता था, लेकिन अब इसे भोपाल के संस्थान में तैयार कर लिया है. एक बार लगाया टीका लगाने पर 6 महीने तक मुर्गियों को लो पैथोजन बीमारी से दूर रखा जा सकेगा.

पोल्ट्री से जुड़े जानकारी यह भी बताते हैं कि भोपाल संस्थान में हाई पैथोजन का टीका तैयार करने की दिशा में काम चल रहा है और यह आखिरी चरण में है. अभी बस थोड़ा काम और बचा है. उसके बाद टीका बना कर तैयार कर दिया जाएगा. लो पैथोजन एवियन इन्फ्लूएंजा भी कहा जाता है. अगर मुर्गियों के बीच एवियन इनफ्लुएंजा फैलता है तो फिर ऐसे हालात में मुर्गियों को जमीन में दफनाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता है. इसकी पहचान ये है कि मुर्गियों में जुकाम होना, छींक आना और सांस बीमारी होना जैसा लक्षण दिखता है.

देश में साल 2003 से बर्ड फ्लू के केस आ रहे हैं. कई बार पोल्ट्री कारोबार को इसके चलते बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ चुका है. अगर एक बार फिर यह बीमारी मुर्गियों में फैल जाए तो आम इंसान कई महीने तक चिकन और अंडे को हाथ तक नहीं लगाता है. जिसके चलते पोल्ट्री कारोबार ठप पड़ जाता है. पोल्ट्री कारोबारियों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ जाता है. हालांकि हाई पैथोजन की वैक्सीन आने के बाद इस नुकसान को बचा जा सकता है.

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