नई दिल्ली. सरकार पशुपालन को बढ़ावा देना चाहती है और इसमें सबसे बड़ा रोड़ा पशुओं की बीमारिया हैं. जिसके चलते पशुपालकों को नुकसान होता है. ऐसे में सरकार की तरफ से कई ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे पशुओं की बीमारियों को दूर किया जा सके और ज्यादा उत्पादन मिले. इससे किसानों को फायदा भी होगा और ज्यादा से ज्यादा लोग पशुपालन के काम में आए आएंगे. गौरतलब है कि हर साल अप्रैल के आखिरी शनिवार को विश्व पशु चिकित्सा दिवस (World Veterinary Day) मनाया जाता है. जिसका मकसद जानवरों की देखभाल के प्रति जागरूकता बढ़ाना है.
बताते चलें कि सरकार तरफ से पशुओं की बीमारियों पर कंट्रोल करने के लिए राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत 2019 में की गई थी. जिसके तहत खुरपका, मुंहपका रोग और ब्रूसेलोसिस के नियंत्रण के लिए 13 हजार 343 करोड़ रुपए 2023-24 तक खर्च किया गया है. राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनएडीसीपी) एक फ्लैगशिप कार्यक्रम है. जिसके तहत एफएमडी के लिए गोपशु, भैंस, भेड़, बकरी और अन्य की आबादी का 100 फीसद और ब्रुसेलोसिस के लिए 4-8 महीने की आयु की बोवाइन मादा बछियों का 100 फीसद टीकाकरण करने का लक्ष्य था.
पशुधन उत्पादन को बढ़ाना है टारगेट
एफएमडी और ब्रूसेलोसिस के लिए राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनएडीसीपी) का समग्र उद्देश्य टीकाकरण के द्वारा 2025 तक एफएमडी का नियंत्रण और 2030 तक इसे पूरी तरह से खत्म करना है.
इसके नतीजे में घरेलू उत्पादन में वृद्धि और दूध और पशुधन उत्पादों के निर्यात में वृद्धि करने का लक्ष्य सरकार का है.
साथ ही पशुओं में ब्रूसेलोसिस के नियंत्रण के लिए की गई पहल के नतीजे में पशुओं और इंसानों दोनों में, इस बीमारी का प्रभावी प्रबंधन भी होगा.
एफएमडी और ब्रुसेलोसिस के लिए राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनएडीसीपी) एक केंद्रीय क्षेत्र योजना है जहां राज्यों, संघ राज्य क्षेत्रों को केंद्र सरकार द्वारा 100 फीसद रकम दी गई.
एफएमडी और ब्रुसेलोसिस के लिए एनएडीसीपी के तहत प्रमुख गतिविधियों की बात की जाए तो जुगाली करने वाले छोटे पशुओं (भेड़-बकरियों) और अन्य को छह माह पर वैक्सीनेशन किया जाता है.
टीकाकरण से एक महीने पहले डीवॉर्मिंग की जाती है. कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए राज्य पदाधिकारियों के उन्मुखीकरण सहित राष्ट्रीय, राज्य, ब्लॉक और ग्राम स्तर पर प्रचार और जन जागरूकता अभियान चलता है.
वहीं ईयर-टैगिंग, पंजीकरण और डेटा अपलोड करके टारगेट के मुताबिक पशुओं की पहचान करना और पशु उत्पादकता और स्वास्थ्य के लिए सूचना नेटवर्क (आईएनएपीएच) के पशु स्वास्थ्य मॉड्यूल में डेटा अपलोड होता है.
निष्कर्ष
हर साल अप्रैल के आखिरी शनिवार को विश्व पशु चिकित्सा दिवस मनाया जाता है. जिसके तहत पालतू जानवरों के देखभाल के साथ-साथ डेयरी पशुओं की देखभाल उनकी बीमारियों को दूर करने के लिए तमाम लोगों को जागरूक करने का काम इसके तहत किया जाता है. वहीं इंसानों और पर्यावरण को विश्वास रखने के लिए पशु चिकित्सकों की भूमिका के बारे में बात होती है.











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