नई दिल्ली. तीसरे राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन एवं पुरस्कार समारोह-2026 में राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के अध्यक्ष डॉ. मीनेश शाह ने कृषि की सस्टेनेबिलिटी में डेयरी और मत्स्य पालन जैसे संबद्ध क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया. उन्होंने आयोजकों को इन क्षेत्रों को सस्टेनेबल कृषि के साथ जोड़ने के लिए बधाई देते हुए कहा कि विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कृषि एवं पशुधन क्षेत्र से अधिक से अधिक किसानों को जोड़ना और उनकी आय बढ़ाना आवश्यक है. उन्होंने भारत के डेयरी क्षेत्र की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत आज विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और दूध उत्पादन में लगभग 5–6% की वार्षिक वृद्धि हो रही है.
मीथेन उत्सर्जन को कम करना है बड़ी चुनौती
उन्होंने बताया कि देश का दूध उत्पादन लगभग 248 मिलियन मीट्रिक टन है और लगभग 2.5 करोड़ किसान प्रत्यक्ष सहकारी नेटवर्क से जुड़े हैं. उन्होंने छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए सहकारिता द्वारा बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराने और महिलाओं के सशक्तीकरण में डेयरी क्षेत्र की भूमिका को भी रेखांकित किया.
सस्टेनेबिलिटी के संदर्भ में डॉ. शाह ने कहा कि भारत के पास विश्व में सबसे बड़ी डेयरी पशुधन आबादी है और इस कारण से पशुओं से होने वाले मीथेन उत्सर्जन को कम करना एक महत्वपूर्ण चुनौती है. उन्होंने पशु उत्पादकता बढ़ाने को इसका एक प्रमुख समाधान बताया.
राष्ट्रीय गोकुल मिशन, सेक्स-सॉर्टेड सीमन, भ्रूण प्रत्यारोपण और आईवीएफ जैसी पहलों के माध्यम से नस्ल सुधार और उत्पादकता बढ़ाने के प्रयासों का उल्लेख किया.
उन्होंने कहा कि कम पशुओं से अधिक उत्पादन प्राप्त करना सस्टेनेबल डेयरी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है.
उन्होंने दूध और गोबर की एकीकृत मूल्य शृंखला विकसित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया.
गोबर से बायोगैस, कम्प्रेस्ड बायोगैस और जैविक उर्वरक तैयार करके एक ओर मीथेन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है.
वहीं दूसरी ओर किसानों के लिए अतिरिक्त आय और ऊर्जा के स्रोत सृजित किए जा सकते हैं.
उन्होंने बताया कि एनडीडीबी इस दिशा में कार्य कर रही है और गोबर को संसाधन के रूप में उपयोग करने वाले विकेंद्रीकृत तथा बड़े स्तर के मॉडल को बढ़ावा दे रही है.
अपने संबोधन के समापन में डॉ. शाह ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी अब भविष्य की चिंता नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता है.
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव आज स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं और इसलिए प्रत्येक क्षेत्र में सस्टेनेबिलिटी को विकास का अभिन्न हिस्सा बनाना सामूहिक जिम्मेदारी है.
उन्होंने आगाह किया कि केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है. विकास के साथ पर्यावरण की रक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरणीय क्षति की कीमत न चुकानी पड़े.










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