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Animal Husbandry: जनवरी में ठंड से पशु पड़ रहे बीमार, चोकर, मक्का, जौ और सरसों खली खिलाएं

अप्रैल महीने में भैंसे हीट में आती हैं और यह मौसम उनके गर्भाधान के लिए सही है. लेकिन इस बार अप्रैल के महीने में गर्मी अधिक है. ऐसे में गर्भाधान में प्रॉब्लम आ सकती है.
प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली. जनवरी का महीना चल रहा है. इस दौरान कड़ाके की ठंड पड़ रही है और इसका असर न सिर्फ इंसानों बल्कि जानवरों पर भी देखने को मिल रहा है. करीब एक महीने से पड़ रही भीषण ठंड की वजह से हजारों मवेशी बीमार पड़ रहे हैं. पशुपालन विभाग के अनुसार ठंड बढ़ने के साथ ही मवेशियों में सर्दी, खांसी, निमोनिया, बुखार, भूख न लगना और दूध उत्पादन में कमी जैसी समस्याएं तेजी से सामने आ रही हैं. इसके चलते पशुपालकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है. क्योंकि एक तो दूध उत्पादन कम हो रहा है दूसरा इलाज पर खर्च अलग से हो रहा है.

एक्सपर्ट का कहना है कि छोटे बछड़े, दुधारू गाय-भैंस और कमजोर पशु पर ठंड का असर ज्यादा दिखाई दे रहा है. सिर्फ बिहार के सिवान की ही बात की जाए तो यहां हर एक प्रखंड पशु चिकित्सालय पर एक महीने के अंदर पांच सौ बीमार पशु का इलाज किया गया है. वहीं जिन पशुपालकों ने बाहर या खुद से पशुओं का इलाज किया है वो आंकड़े को और बढ़ाने वाले हैं. वहीं प्रशासन के निर्देश पर पशु चिकित्सक फील्ड में जाकर पशुओं का इलाज कर रहे हैं.

ठंड के मौसम से पशुओं को कैसे बचाएं
ठंड में पशुओं को ज्यादा एनर्जी की जरूरत होती है. इसलिए चोकर, मक्का, जौ, सरसों खली, तेल की खल्ली, दाना मिश्रण और गुड़ जैसे ऊर्जादायी आहार देना चाहिए.

घरेलू उपाय के रूप में सरसों के तेल में लहसुन पकाकर मालिश करने से पशु के शरीर में गर्माहट आती है.

पशुओं को अजवाइन, सोंठ, हल्दी और गुड़ का मिश्रण देना चाहिए. ये सर्दी-खांसी में फायदेमंद होता है.

पशुओं को बासी, फफूंद लगा या सड़ा हुआ चारा, बहुत ठंडा पानी, भीगा भूसा और अचानक अधिक हरा चारा नहीं खिलाना चाहिए.

इस तरह का चारा देने से दस्त, कमजोरी और दूध उत्पादन में और गिरावट आ सकती है.

साथ ही समय पर टीकाकरण, नियमित स्वास्थ्य जांच, साफ-सफाई और संतुलित आहार अपनाकर सर्दियों में पशुधन को गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकता है.

सही देखभाल से न केवल पशुओं की जान बचती है. बल्कि दूध उत्पादन और पशुपालकों की आय भी सुरक्षित रहती है.

मवेशियों को ठंड से बचाने के लिए सूखा एवं ढका हुआ स्थान, पुआल या बोरे की बिछावन, तथा ठंडे हवा के सीधे संपर्क से बचाव की व्यवस्था करें.

पशु ठंड में हाइपोथर्मिया और गलाघोंटू के साथ साथ वायरल बीमारियों की चपेट में भी आ जाते हैं. इनमें खुरपका-मुंहपका प्रमुख है.

इससे पशुओं के मुंह और खुरों में छाले पड़ जाते हैं, वे ठीक से खड़े नहीं हो पाते, चारा खाना बंद कर देते हैं और दूध उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है.

कई मामलों में कमजोरी के कारण पशु खड़े होने में भी असमर्थ हो जाते हैं. सर्दियों में डेयरी फार्म को ठंडी हवा और नमी से बचाना जरूरी है.

पशुशाला को बोरी, पुआल या तिरपाल से ढाकें, फर्श सूखा रखें और विछावन में पर्याप्त भूसा डालें.

Written by
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