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Animal Husbandry: पशुओं का बांझपन दूर करने के लिए करें कुछ खास उपाय, मिलेगा फायदा

ब्रुसेलोसिस ब्रुसेला बैक्टीरिया के कारण होता है जो मुख्य रूप से पशुधन (जैसे गाय, भेड़, बकरी) में पाए जाते हैं.
प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली. भारत एक कृषि प्रधान देश है. हालांकि देश कृषि के साथ—साथ पशुपालन भी आय की दृष्टि से अच्छा व्यवसाय है. ये दोनों व्यवसाय एक दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर हैं. कृषि के बगैर पशुपालन सम्भव नहीं है और पशुपालन के बिना कृषि. सच कहें तो ये दोनों एक दूसरे की रीढ़ हैं. वैसे तो हमारा देश भारत पिछले 8-10 वर्षों से दूध उत्पादन के क्षेत्र में पहले स्थान पर है लेकिन प्रति पशु दूध उत्पादन देखा जाए तो विदेशों की तुलना में काफी कम हैं वैसे तो पशु संख्या के आधार पर हमारे देश में सबसे अधिक पशु पाले जाते है.

प्रति पशु दूध उत्पादन कम होने के कुछ मुख्य कारण है एक तो हमारे देश में अशुद्ध नस्ल के पशु अधिक संख्या में हैं दूसरा मुख्य कारण है दुधारू पशुओं में बांझपन. पशु के बांझपन हो जाने के कारण अच्छी नस्ल के पशु भी स्लाटर हाउस में काट दिए जाते हैं. जिससे न केवल किसानों को भारी आर्थिक क्षति होती है बल्कि प्रजनन पर भी असर होता है. जिससे दिन प्रतिदिन अच्छे पशुओं की संख्या लगातार घट रही है.

संतुलित आहार जरूर खिलाएं
दुधारू पशुओं में बांझपन के निदान के लिए यदि हम कुछ विशेष सावधानी बरतें तो इस समस्या का निदान हो सकता है. इस समस्या के खात्मे के लिए सबसे पहले हमें दुधारू पशुओं के खानपान व रहन-सहन पर ध्यान देना होगा. इसके लिए हमें अपने दुधारू पशु को संतुलित आहार खिलाने की जरूरत है और संतुलित आहार पशु के दूध उत्पादन के आधार पर खिलाना चाहिए. दुधारू भैंस को दो लीटर दूध पर 1 किलो ग्राम राशन व गाय को 2.5 लीटर दूध पर 1 किग्रा. राशन खिलाना चाहिए. इसके अलावा 1-1.5 किलो ग्राम राशन जीवन निर्वाह के लिए देना चाहिए.

भिगोकर खिलाएं पशुओं को दाना
एनिमल एक्सपर्ट का कहना है कि संतुलित आहार देने का सही तरीका अपनाना चाहिए. पशु को दाना खिलाने के लिए सुबह का दाना शाम को और शाम का दाना सुबह को भिगो देना चाहिए. पशु पालकों को ध्यान रखना चाहिए कि अधिकतर पशुपालक गाभिन पशु को दाना या अच्छा चारा तब तक ही देते हैं. जब तक पशु दूध देते हैं. दूध से हटने के बाद पशु को सूखे चारे या तुड़ी पर छोड़ देते हैं. जबकि इस समय पशु को और अधिक अच्छे चारे व दाने की जरूरत हैं क्योंकि यह वह समय है जिसमें पशु को अगले ब्यांत के लिए भी तैयार होना है और पेट में पल रहे बच्चे का भी भरण-पोषण करना है.

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