नई दिल्ली. 16 अक्टूबर को दुनियाभर में विश्व खाद्य दिवस (World Food Day) मनाएगी. भुखमरी को खत्म करने और टिकाऊ खाद्य प्रणालियों को आगे बढ़ाने की जरूरत पर चर्चा होगी. इस दिन दुनियाभर में एक्सपर्ट जलवायु संकटों, संघर्षों और आर्थिक अस्थिरता के बीच, यह विषय सरकारों, किसानों, व्यवसायों और समुदायों को एक साथ लाकर लचीली, पौष्टिक और टिकाऊ खाद्य प्रणालियां बनाने के लिए सामूहिक तौर पर काम करने पर जोर देते हैं. मीडिया रिपोर्ट की मानें तो दुनियाभर में पोषण के लिए पर्याप्त भोजन का उत्पादन होता है लेकिन फिर भी 8.2 अरब लोगों में से 2024 के आंकड़े के मुताबिक 67.3 करोड़ लोगों को किसी न किसी समय भूख का सामना करना पड़ा.
इसकी वजह कई है. अफ्रीका और पश्चिमी एशिया को संघर्षों और मौसम की मार से विश्व खाद्य कार्यक्रम के अनुसार, गाजा, सूडान जैसे क्षेत्रों में 19 लाख लोग भयावह भूखमरी का सामना कर रहे हैं. दुनिया भर में, 73.3 करोड़ लोग कुपोषण से पीड़ित हैं, जबकि 2.8 अरब लोग बढ़ती कीमतों और जीवन-यापन की बढ़ती लागत के कारण स्वस्थ आहार का खर्च वहन करने में असमर्थ हैं.
चिकन-मटन क्यों है जरूरी
भारत जैसे देश में भी पोषण की कमी है. इस वजह से हजारों लोग कुपोषण के शिकार हैं. खाद्य आपूर्ति के लिए चिकन-मटन एक बेहतरीन विकल्प है. खासतौर पर मटन चिकन सस्ता भी है. इसकी वजह से गरीब लोगों की पहुंच भी इस तक आसान है.
बात मटन की जाए तो जिसमें बकरी और भेड़ का मांस आता है दोनों ही पशु-आधारित खाद्य आपूर्ति का हिस्सा हैं.
इनसे प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स की पूर्ति होती है और ये हमारे पोषण व खाद्य सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं. हालांकि ये दोनों ही मीट महंगे हैं.
चिकन की बात करें तो हल्का मांस माना जाता है, इसमें सैचुरेटेड फैट कम और प्रोटीन ज्यादा पाया जाता है.
इसमें विटामिन बी 6, नियासिन, सेलेनियम और फॉसफोरस अच्छी मात्रा में मिलता है. देश में तकरीबीन 52 फीसद लोग चिकन का सेवन करते हैं.
वहीं दूसरी ओर मटन थोड़ा भारी होता है, लेकिन इसमें आयरन, जिंक, विटामिनट बी 12 और उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन होता है.
खाद्य आपूर्ति (Food Supply) की बात की जाए तो भारत समेत कई देशों में पोल्ट्री फार्मिंग (Chicken farming) और लाइवस्टॉक फार्मिंग (Goat/Sheep rearing) से बड़ी मात्रा में चिकन व मटन की आपूर्ति होती है.
चिकन जल्दी तैयार हो जाता है. 40-45 दिन में ब्रायलर मुर्गे मार्केट में बिकने के लिए तैयार हो जाते हैं. इसलिए ये जल्दी और सस्ती आपूर्ति देते हैं.
वहीं दूसरी ओर मटन की आपूर्ति धीमी होती है. बकरी या फिर भेड़ को बड़ा करने में 8–12 महीने से ज्यादा का समय लगता है. इसलिए मटन महंगा होता है.
चिकन न सिर्फ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसान की आय के बड़ा सोर्स है बल्कि चिकन से बढ़ती जनसंख्या को सस्ती और पौष्टिक प्रोटीन सप्लाई की जा सकती है. चिकन शाकाहारी और दालों पर दबाव कम करके विविधता (diversity) और संतुलित आहार सुनिश्चित करता है.












