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Cold Water Fisheries: बढ़ गया है कोल्ड वॉटर फिशरीज का दायरा, उत्पादन में आया उछाल

रंगीन मछलियां घर हो या आफिस दोनों जगहों को और सुंदर बनाती हैं.
प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली. भारत का कोल्ड वॉटर फिशरीज क्षेत्र आजीविका पैदा करके, पोषण में सुधार करके, इको-टूरिज्म को बढ़ावा देकर और टिकाऊ पहाड़ी विकास को समर्थन देकर ब्लू इकोनॉमी के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में उभर रहा है. कभी हिमालय की धाराओं में पारंपरिक मछली पकड़ने तक सीमित रहने वाला यह क्षेत्र, अब वैज्ञानिक खेती और उन्नत बुनियादी ढांचे द्वारा समर्थित एक आधुनिक एक्वाकल्चर इकोसिस्टम में विकसित हो चुका है. कोल्ड वॉटर फिशरीज उच्च ऊंचाई वाली, बर्फ से पोषित नदियों, धाराओं, झीलों और जलाशयों में किया जाता है. जहां तापमान 5°C से 25°C के बीच, घुलित ऑक्सीजन 6 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक और पीएच स्तर 6.5 से 8.0 के बीच होता है.

रेनबो ट्राउट, गोल्डन महासीर और स्नो ट्राउट जैसी प्रजातियों का पालन हैचरी, रेसवे, आरएएस, बायोफ्लॉक सिस्टम और कोल्ड चेन सुविधाओं सहित विशेष बुनियादी ढांचे का उपयोग करके किया जाता है. ट्राउट की खेती आमतौर पर 1,500 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर की जाती है, जबकि महासीर का पालन अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर उपयुक्त होता है.

कोल्ड वॉटर फिशरीज का योगदान लगभग 3 प्रतिशत
कोल्ड वॉटर फिशरीज जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय और नागालैंड के साथ-साथ पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के पहाड़ी जिलों में फल-फूल रहा है.

संयुक्त रूप से, ये इकोसिस्टम 5.33 लाख वर्ग किमी से अधिक के पहाड़ी क्षेत्र को कवर करते हैं.

भारत ने शीत जल की 278 से अधिक मछली प्रजातियों की पहचान की है, जो इस क्षेत्र को जैव विविधता संरक्षण और टिकाऊ पहाड़ी विकास के लिए महत्वपूर्ण बनाती है.

वर्ष 2024–25 के दौरान भारत का कुल मछली उत्पादन लगभग 197.75 लाख टन तक पहुंच गया, जिसमें अंतर्देशीय मछली उत्पादन में कोल्ड वॉटर फिशरीज का योगदान लगभग 3 प्रतिशत रहा.

राष्ट्रीय कोल्ड वॉटर मछली उत्पादन वर्तमान में लगभग 7,000 मीट्रिक टन है, जबकि अकेले ट्राउट उत्पादन पिछले दशक की तुलना में लगभग 1.8 गुना बढ़कर 2024–25 में लगभग 6,000 मीट्रिक टन हो गया है.

जम्मू और कश्मीर 2024-25 में लगभग 3,010 मीट्रिक टन उत्पादन के साथ भारत के अग्रणी ट्राउट उत्पादक क्षेत्र के रूप में उभरा है, जिसे कोकरनाग हैचरी और 2,000 से अधिक निजी ट्राउट इकाइयों का समर्थन प्राप्त है.

हिमाचल प्रदेश ने 2025–26 में 909 ट्राउट किसानों और 1,739 ट्राउट खेती इकाइयों के साथ लगभग 1,673 मीट्रिक टन ट्राउट का उत्पादन किया.

उत्तराखंड ने 2024–25 के दौरान पिथौरागढ़, बागेश्वर और चमोली जैसे जिलों में लगभग 2,500 रेसवे के सहयोग से लगभग 710 मीट्रिक टन ट्राउट उत्पादन और 10,486 मीट्रिक टन का कुल मछली उत्पादन दर्ज किया.

लद्दाख ने अपनी विषम जलवायु परिस्थितियों के बावजूद 120 रेसवे और चार हैचरी के साथ 50 मीट्रिक टन उत्पादन को पार कर लिया है.

अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय और नागालैंड सहित उत्तर-पूर्वी राज्य लगातार हैचरी और ट्राउट खेती का विस्तार कर रहे हैं.

जबकि केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु वायनाड, नीलगिरी और उत्तर कन्नड़ जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में पायलट आरएएस और बायोफ्लॉक सिस्टम को अपना रहे हैं.

इस क्षेत्र ने आजीविका के महत्वपूर्ण अवसर पैदा किए हैं. कोल्ड वॉटर वाले राज्यों में 23.51 लाख परिवारों को आजीविका सहायता मिली है.

जबकि 33.78 लाख मछुआरों को बीमा योजनाओं के तहत कवर किया गया है. अकेले जम्मू और कश्मीर में 31,000 से अधिक पंजीकृत मछुआरे और मछली पालक हैं.

Written by
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