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Animal Husbandry: देश के 51 शहरों में गलाघोंटू बीमारी का खतरा, यहां पढ़ें लक्षण और बचाव का तरीका

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बाड़े में बंधी भैंस. livestockanimalnews

नई दिल्ली. आमतौर पर भैंस को गलाघोंटू बीमारी होती है. इसका वैज्ञानिक नाम हेमोरेजिक सेप्टिसीमिया भी है. ये इतनी खतरनाक बीमारी है कि इसमें अक्सर मवेशियों की मौत भी हो जाती है. पशु विशेषज्ञों का कहना है कि गलघोंटू बीमारी उन स्थानों पर पशुओं में अधिक होती है, जहां पर बारिश का पानी इकट्ठा हो जाता है. इस रोग के बैक्टीरिया गंदे स्थान पर रखे जाने वाले पशुओं तथा लंबी यात्रा या अधिक काम करने से थके पशुओं पर जल्दी हमला कर देते हैं. जबकि गंभीर बात ये भी है कि रोग का फैलाव बहुत तेजी से होता है.

एक्सपर्ट के मुताबिक हेमोरेजिक सेप्टीसीमिया (एचएस), मवेशियों और भैंसों की एक बहुत ही खतरनाक बीमारी है. कई जगहों पर इस बीमारी को गलघोंटू के अलावा ‘घूरखा’, ‘घोंटुआ’, ‘अषढ़िया’, ‘डकहा’ आदि नामों से भी जाना जाता है. जिसका वक्त रहते इलाज न किये जाने पर पशुओं की मौत होने से पशुपालकों को बहुत नुकसान उठाना पड़ता है. इसलिए जरूरी है कि इस बीमारी का वक्त से इलाज किया जाए.

इन राज्यों के 51 शहरों के लिए अलर्ट
पशुपालन को लेकर काम करने वाली निविदा संस्था के मुताबिक भैंस में होने वाली खतरनाक बीमारी गलाघोंटू का असर मई महीने में देश के 51 शहरों में दिखाई दे सकता है. संस्था की ओर से दावा किया गया है कि यह बीमारी असम के चार शहरों, गुजरात के एक शहर, कर्नाटक के चार, केरल के तीन, मध्य प्रदेश के एक, महाराष्ट्र के तीन, मणिपुर के एक, मेघालय के एक, उड़ीसा के तीन, पंजाब के दो, राजस्थान के एक, त्रिपुरा के एक, उत्तर प्रदेश के दो और वेस्ट बंगाल के दो शहरों में भैंसों को अपनी चपेट में ले सकती है. सबसे ज्यादा खतरा झारखंड में है. यहां के 16 जिलों में इस बीमारी खतरा बताया गया है.

क्या है गलाघोंटू बीमारी के लक्षण
अगर गलाघोंटू बीमारी के लक्षण की बात की जाए तो एक्सपर्ट कहते हैं कि पशुओं में साथ-साथ घुर्र-घुर्र की आवाज आती है. पशु बहुत ज्यादा अवसाद में रहते हैं. मुंह से लार का बहना, नासिका स्राव, अश्रुपातन, गर्दन एवं झूल के साथ-साथ गुदा के आस पास (पेरिनियम) की सूजन रोग के सामान्य लक्षण दिखाई देते हैं. वहीं रोग की घातकता कम होने की स्थिति में निमोनिया, दस्त या पेचिस के लक्षण भी पशुओं में रहते हैं. इस बीमारी के लग जाने के बाद पशुओं की मौत के चांसेज बहुत ज्यादा होते हैं.

क्या है इस खतरनाक बीमारी का इलाज
एनिमल एक्सपर्ट कहते हैं कि पशुओं में अगर ऐसी बीमारी लगे जो एक से दूसरे में प्रसार करती है तो तुरंत बीमार पशु को अलग बांधना चाहिए. वहीं गलाघोंटू रोग की भी पहचान होने पर तुरंत बीमारी पशु को बाकी पशुओं से अलग कर देना चाहिए. इतना ही नहीं बीमार पशुओं को साफ पानी, हरा चारा (Animal Nutrition) और पशु आहार (Animal Green Feed) खिलाना फायदेमंद होता है. अगर किसी वजह से पशु की जान चली जाती है, तो गड्ढे में नमक और चूना डालकर पशुओं को दफनायें. इससे अन्य पशुओं को बचाया जा सकता है.

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