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Fish Farming: बायोफ्लॉक और RAS तकनीक से कम संसाधन में मिलता है ज्यादा मछली उत्पादन

तालाब में खाद का अच्छे उपयोग के लिए लगभग एक सप्ताह के पहले 250 से 300 ग्राम प्रति हेक्टेयर बिना बुझा चूना डालने की सलाह एक्सपर्ट देते हैं.
तालाब में मछली निकालते मछली पालक

नई दिल्ली. जहां एक ओर मछली पालन को बढ़ावा देने का काम किया जा रहा है तो वहीं मछली पालन में वैज्ञानिक तरीकों को भी बढ़ावा देने काम सरकार कर रही है. जिससे मछली पालकों को ज्यादा फायदा हो. इसलिए ‘रीसर्क्युलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम’ (RAS) और ‘बायोफ्लॉक एक्वाकल्चर सिस्टम’ (BAS) जैसी तकनीकों की जानकारी मछली किसानों को दी जा रही है. हाल ही में लुधियाना स्थित गुरु अंगद देव वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेज यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ फिशरीज (COF) ने अपने अत्याधुनिक ‘क्षमता निर्माण संसाधन केंद्र’ (CBRC) में ‘जलवायु-अनुकूल सघन मछली पालन तकनीकों’ पर तीन दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम का सफलतापूर्वक आयोजन किया.

इस केंद्र की स्थापना भारत सरकार के मत्स्य पालन विभाग (DOF) की ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’ (PMMSY) के तहत की गई थी, ताकि इस क्षेत्र में पर्यावरण-अनुकूल, पानी की बचत करने वाली और टिकाऊ मछली पालन तकनीकों को बढ़ावा दिया जा सके.

बेहतरीन है दोनों तकनीक
COF की डीन डॉ. मीरा डी. अंसल ने बताया कि ‘रीसर्क्युलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम’ (RAS) और ‘बायोफ्लॉक एक्वाकल्चर सिस्टम’ (BAS) जैसे सघन मछली पालन सिस्टम बेहतरीन है.

असल में इसमें पारंपरिक तालाब खेती के तरीकों की तुलना में प्रति किलोग्राम मछली उत्पादन के लिए केवल 10-15 फीसद पानी और जमीन के संसाधनों की जरूरत होती है.

साथ ही, ये सिस्टम आधुनिक दुनिया में खाद्य सुरक्षा की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए अच्छी गुणवत्ता वाली मछली के उत्पादन के लिए अधिक सुरक्षित (बायो-सिक्योर) वातावरण प्रदान करते हैं.

इस कार्यक्रम में 22 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें युवा, मछली पालक और पंजाब के मत्स्य पालन विभाग (DOF) के अधिकारी शामिल थे.

उन्हें RAS और BAS की डिजाइनिंग, संचालन और प्रबंधन आदि पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया.

इसमें पानी की गुणवत्ता की निगरानी, ​​खिलाने का तरीका, बायोफ्लॉक उत्पादन, बायो-सिक्योरिटी (सुरक्षा) के इंतजाम और स्वास्थ्य प्रबंधन के साथ-साथ कचरा प्रबंधन और उसके आर्थिक पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) के बारे में भी जानकारी दी गई.

प्रशिक्षुओं को RAS और BAS के लिए उपयुक्त मछली प्रजातियों के बारे में भी बताया गया, ताकि क्षेत्रीय उपलब्धता और बाज़ार की मांग के अनुसार इन सिस्टम की आर्थिक व्यवहार्यता सुनिश्चित की जा सके.

इस कार्यक्रम की मुख्य विशेषता शिक्षित शहरी और ग्रामीण युवाओं (90%) की भागीदारी थी, जो आत्मनिर्भरता के लिए मत्स्य पालन क्षेत्र में उद्यमिता के प्रति उनकी बढ़ती रुचि को दर्शाती है.

सभी प्रतिभागियों को सब्सिडी और लोन के रूप में स्टार्ट-अप के लिए वित्तीय सहायता पाने की विभिन्न योजनाओं के बारे में भी जानकारी दी गई.

साथ ही, उन्हें विभिन्न वित्तीय प्रोत्साहन पाने के लिए ‘प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना’ (PM-MKSSY) के तहत ‘नेशनल फिशरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म’ (NFDP) पर पंजीकरण करने के लिए प्रोत्साहित किया गया.

Written by
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