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Fisheries: रिसर्च सेंटरों और सरकारी-निजी एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल से बढ़ेगा देश में मछली उत्पादन

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प्रतीकात्मक तस्वीर.

नई दिल्ली. भारत लगातार फिशरीज सेक्टर में अच्छा काम कर रहा है. जिसके चलते इससे जुड़े किसानों की इनकम में भी इजाफा हो रहा है. वहीं मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के मत्स्य पालन विभाग संयुक्त सचिव (अंतर्देशीय मत्स्य पालन) सागर मेहरा ने बताया कि 34 मछली पालन क्लस्टरों को ‘विकास के इंजन’ के तौर पर विकसित किया जा रहा है, ताकि उत्पादन, प्रोसेसिंग और बाजार से जुड़ाव और निर्यात को एक साथ जोड़ा जा सके. उन्होंने ‘लास्ट-माइल इंफ्रास्ट्रक्चर’ (अंतिम छोर तक की बुनियादी सुविधाओं) को मज़बूत करने, आईओटी, बायोफ्लॉक और आरएएस जैसी तकनीकों को अपनाने को बढ़ावा देने की बात कही.

साथ ही ‘कोल्ड-चेन’ सुविधाओं को बेहतर बनाने और एफआईडीएफ, केसीसी तथा बाजार से जुड़ाव के बीच की कमियों को दूर करके लोन के कम उपयोग की समस्या को सुलझाने की जरूरत पर जोर दिया. आईसीएआर के उप महानिदेशक (मत्स्य विज्ञान), डॉ. जे.के. जेना ने इस बात की जानकारी दी कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है. उन्होंने राष्ट्रीय उत्पादन में आंध्र प्रदेश के योगदान की सराहना की.

सरकारी संस्थानों से मिल रही बड़ी मदद
उन्होंने कहा कि भीमवरम क्लस्टर में अग्रणी ‘एक्वाकल्चर जोन’ (जलीय कृषि क्षेत्र) के रूप में उभरने की अपार क्षमता है.

सीआईबीए सहित आईसीएआर के विभिन्न संस्थान, इस क्लस्टर को प्रौद्योगिकी के प्रसार, रोगों की पहचान और निगरानी कार्यक्रमों के माध्यम से लगातार सहयोग दे रहे हैं.

भविष्य में भी विकास तेजी से हो, इसके लिए किसानों, रिसर्च सेंटरों, सरकारी-निजी एजेंसियों और मूल्य-श्रृंखला से जुड़े अन्य संबंधित पक्षों के बीच और अधिक बेहतर तालमेल की आवश्यकता है.

आंध्र प्रदेश के मत्स्य आयुक्त, राम शंकर नाइक ने किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से ‘वैल्यू-एडेड’ (मूल्य-वर्धित) समुद्री खाद्य उत्पादों को बढ़ावा देकर वैश्विक गुणवत्ता और नियमों की जरूरतों को पूरा करने की आवश्यकता पर जोर दिया.

उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जल-गुणवत्ता को बनाए रखने, रोगों की घटनाओं को कम करने और उत्पादकता में सुधार लाने के लिए खाड़ियों और जल-निकासी प्रणालियों से गाद हटाना तथा उनकी सफ़ाई करना अत्यंत महत्वपूर्ण है.

उन्होंने ‘अच्छी जलीय कृषि प्रबंधन पद्धतियों’, एफएफपीओ के गठन और प्रयोगशाला सुविधाओं की उपलब्धता के महत्व पर भी बल दिया.

इसके साथ ही, उन्होंने किसानों की ‘इनपुट लागत’ (उत्पादन में लगने वाले खर्च) को कम करने के लिए ‘एरेटर’ (हवा देने वाले यंत्रों) पर लगने वाली जीएसटी में कटौती करने का भी अनुरोध किया.

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