नई दिल्ली. बिहार के सभी 38 जिलों में पशुओं के लिए हरा चारा की उपलब्धता सुनिश्चित करने की पहल पर सरकार काम कर रही है. सरकार की मंशा है कि हर हाल में डेयरी पशुओं को हरा चारा उपलब्ध कराया जाए. ताकि दूध उत्पादन में कमी न हो. इसके लिए नए सभी जिलों में हरा चारा मानचित्रण अध्ययन की शुरुआत की गई है. असल में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) और बिहार राज्य दुग्ध सहकारी संघ (कॉम्फेड) ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के सहयोग से सभी जिलों में हरा चारा मानचित्रण अध्ययन आरंभ करने की पहल की है.
इसे लेकर सोमवार को पटना के एक होटल में रिमोट सेंसिंग एवं जीआईएस आधारित हरा चारा मानचित्रण अध्ययन पर वर्कशॉप और सह प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया है. इस मौके पर डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग के सचिव शीर्षत कपिल अशोक ने कहा कि राज्य में दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपायों को अपनाना जरूरी है.
चारा फसलों के क्षेत्रफल और विभिन्न किस्मों का सटीक आकलन किया
इस मौके पर कॉम्फेड के प्रबंध निदेशक समीर सौरभ ने कहा कि हरा चारा मानचित्रण पशुपालकों को हरा चारा उपलब्ध कराने के लिए जरूरी कदम है.
उन्होंने बताया कि कार्यशाला में वीपीएमयू (पटना), तिमूल (मुजफ्फरपुर), डीआरएमयू (बरौनी), एसएमयू (आरा), बिहार शरीफ डेयरी परियोजना (नालंदा) के पदाधिकारी शामिल हुए.
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को रिमोट सेंसिंग एवं जीआईएस तकनीक के उपयोग से हरा चारा मानचित्रण की प्रक्रिया, डाटा संग्रहण एवं विश्लेषण की विधियों की विस्तृत जानकारी दी गई.
उन्होंने कहा कि इससे बेहतर योजना बनाने में मदद मिलेगी और इससे दूध उत्पादन की लागत कम होगी और पशुपालकों को अधिक लाभ मिलेगा.
एनडीडीबी, कोलकाता के क्षेत्रीय प्रमुख डॉ. सब्यसाची रॉय ने वर्चुअल संबोधित किया और इसकी अहमियत पर विचार रखा.
चारा मानचित्रण अध्ययन का मुख्य उद्देश्य राज्य में चारा फसलों के क्षेत्रफल और विभिन्न किस्मों का सटीक आकलन करना है.
दुग्ध उत्पादन की कुल लागत में चारा एवं पशु आहार का लगभग 70 प्रतिशत योगदान होता है.
यह अध्ययन चारा फसल का क्षेत्र, गुणवत्ता वाले बीजों की उपलब्धता तथा सिंचाई सुविधाओं के आधार पर समग्र स्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रदान करेगा.
निष्कर्ष
गौरतलब है कि हरे चारे की कमी हर जगह है. खासतौर पर गर्मियों में हरे चारे की कमी हो जाती है. जिसके चलते ये काफी महंगा मिलता है. इससे दूध की लागत भी बढ़ जाती है और जो किसान पशुओं को भरपूर हरा चारा नहीं खिला पाते हैं तो इससे दूध उत्पादन में कमी होती है. जिससे हर हाल में नुकसान पशुपालकों को होता है.











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