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Poultry: बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग में मुर्गियों को खिला सकते हैं अनाज, किचन वेस्ट है मुर्गियों की बेहतरीन खुराक

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केज में पाली जा रही हैं मुर्गियां. live stock animal news

नई दिल्ली. मोटे तौर पर देखा जाए तो मुर्गी पालन दो तरह से किया जाता है. एक मुर्गी पालन कमर्शियल तरीके से होता है. जबकि दूसरा बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग के जरिए. बहुत से गांव में बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग का चलन वर्षों से है. लोग अपने घरों में यूं ही दो-चार 10 मुर्गी मुर्गियां पाल लेते हैं और इससे उनको फायदा भी मिलता है. एक्सपर्ट का कहना है कि बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग एक ऐसा काम है, जिसे घर की महिलाएं भी कर सकती हैं. इस काम में ज्यादा श्रम की जरूरत भी नहीं पड़ती है. जबकि इस तरीके से किए जाने वाले मुर्गी पालन की ये भी खासियत है कि मुर्गियां या खुद ही अपने लिए खाना भी तलाश कर लेती हैं.

अगर आप भी बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग शुरू करना चाहते हैं तो घर पर शुरुआत में 10 मुर्गी मुर्गियों से इस काम को शुरू कर सकते हैं और इसके लिए आपको ज्यादा जगह की जरूरत भी नहीं पड़ेगी. घर की छत पर या आंगन में भी इन मुर्गी मुर्गियों को पाल सकते हैं और कुछ दिनों में इससे अच्छा उत्पादन भी ले सकते हैं. अगर आप अंडों के उत्पादन के लिए बैकयार्ड मुर्गी पालन करते हैं तो फिर मुनाफा अच्छा मिलता है.

ऐसे पल जाती हैं मुर्गियां
दरअसल जब तक मुर्गी अंडा उत्पादन करती रहती है, फायदा मिलता रहता है. आमतौर पर देसी नस्ल की मुर्गियों का एक अंडा 15 से लेकर 20 रुपए तक आसानी से बिक जाता है.

बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग में जब चूजे एक दिन के या फिर दो-तीन सप्ताह की उम्र के होते हैं तो इसे पाला जाता है.

शुरू में कुछ दिनों के लिए इन्हें किसी सेफ जगह पर और छत के नीचे रखना होता है.

वहीं मौसम को देखते हुए अगले दो तीन हफ्तों के लिए ठंड और परभक्षी जीवों से बचाना पड़ता है.

जहां तक इनके भोजन की व्यवस्था का सवाल है तो ये घर के रसोईघर से फालतू बचे हुए अन्न पर अपना गुजारा कर लेते हैं.

यदि किसान जरूरत समझें और उसके पास उपलब्धता हो तो इन्हें दाल, अनाज जैसे मक्का और गेहूं इत्यादि थोड़ी बहुत मात्रा में दिया जा सकता है.

दिन के समय इन पक्षियों को घर के आंगन में खुला छोड़ देना चाहिए और दिन छिपने पर फिर इन्हें भीतर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा देना ठीक रहता है.

6-7 हफ्तों की उम्र हासिल करते-करते ये पक्षी आपने आप अपनी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो जाते हैं.

आसपास घूमकर अपनी जरूरत के मुताबिक भोजन प्राप्त कर लेते हैं. इस वक्त तक इन्हें शाम के समय अपने घर लौट आने की आदत भी पड़ जाती है.

फिर भी इस दौरान किसानों को इनपर सरसरी नजर तो रखनी ही पड़ती है. नहीं तो यह किसी कुत्ते या बिल्ली का शिकार भी बन सकते हैं.

Written by
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