नई दिल्ली. पशुओं के लिए चारा बेहद ही जरूरी होता है. खासतौर पर हरा चारा. क्योंकि इसकी हमेशा कमी रहती है. जबकि डेयरी पशुओं को बेहतर उत्पादन करने के लिए हरे चारे की हर वक्त जरूरत होती है. अगर सालभर हरा चारा पशुओं को न मिले तो फिर उत्पादन में कमी देखी जा सकती है. राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) पशुपालकों को हरे चारे की अहम जानकारी से रूबरु करा रहा है ताकि लोगों को इसकी जानकारी हो सके. बता दें कि तमाम बेहतरीन चारे में राइस बीन का भी नाम सामने आता है. जिसके बारे यहां आज आपको लाइव स्टक एनिमल न्यूज (Livestock Animal News) अहम जानकारी देने जा रहा है.
राइस बीन बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और उड़ीसा के लिए बहुत महत्वपूर्ण और पोषक चारा फसल है. यह ऐसे स्थानों पर उगायी जा सकती है, जहां ज्यादा पानी मौजूद होता है. क्योंकि इन परिस्थितियों में लोबिया या ग्वार उगाना कठिन होता है. भारत को राइस बीन की उत्पत्ति का स्थान माना जाता है.
कैसे उगाए ये चारा फसल
यह सभी प्रकार की जमीन पर उगायी जा सकती है. दोमट मिट्टी इसके उत्पादन के लिए सबसे अधिक अच्छी मानी जाती है.
खेत तैयार करने के लिए आमतौर पर 1 जुताई और 2-3 बार हैरो चलाना चाहिए.
हरे चारे के लिए, फसल को मार्च-अप्रैल और जून-जुलाई में बोया जा सकता है.
बीज को सीड ड्रिल की मदद से 25-30 सेमी. दूरी पर लाइनों में बोना चाहिए.
अच्छी उपज के लिए 20-25 किग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.
फसल में 8-15 टन गोबर की खाद और 30-40 किग्रा. फोस्फोरस डालना चाहिए.
यदि जमीन का पी.एच. 7 से ज्यादा है तो बुवाई से पहले 25 किग्रा. नाइट्रोजन और 40-45 किग्रा. फोस्फोरस मिट्टी में मिलाना चाहिए.
वर्षा ऋतु में बोयी गई फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है.
अगस्त में बोई गई फसल को 1 या 2 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है.
यह सूखे की अवस्था को भी सहन कर सकती है. गर्मियों में बोई गई फसल को 2-3 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है.
पूर्वी भारत में जहाँ यह फसल अधिक प्रचलित है, आमतौर पर सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि वहाँ जल स्तर कम गहराई पर है.
फसल 80-90 दिनों में चारे में इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाती है.
इस अवस्था में कटाई करने पर 30-40 टन हरा चारा प्रति हैक्टेयर प्राप्त होता है.
यह फसल सिर्फ एक कटाई देती है जोकि फली बनने की अवस्था पर ली जाती है.












