नई दिल्ली. भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान के संयुक्त निदेशालय, प्रसार शिक्षा द्वारा लुधियाना-पंजाब के विषय वस्तु विशेषज्ञ तथा पशु चिकित्साधिकारियों के लिए जय गोपाल केंचुए के माध्यम से वर्मी कामपोस्टिंग विषय पर दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया. यह कार्यक्रम आईसीएआर-अटारी जोन-प्रथम, पीएयू कैम्पस लुधियाना-पंजाब द्वारा प्रायोजित किया गया है. जहां गोबर से जैविक खाद बनाने का तरीका बताया गया है. इस दौरान संस्थान की ज्वाइंट डायरेक्टर डा. रूपसी तिवारी ने कहा कि हमारे देश में रोज 3 मीलियन टन तक गोबर का उत्पादन हो रहा है. अगर इससे जैविक खाद बनाई जाए तो किसानों को भी फायदा होगा और पर्यावरण भी सही रहेगा.
उन्होंने कहा कि अगर पंजाब की बात करें तो सिर्फ लुधियाना जिलेे में ही 600 से 650 टन गोबर का उत्पादन हो रहा है. उन्होंने कहा कि आईवीआरआई जय गोपाल वर्मीकल्चर तकनीक एक स्वदेशी केंचुआ प्रजाति (पेरियोनिक्स सीलानेसिस) का उपयोग करके जैविक खाद बनाने की एक विधि है, जो उच्च प्रजनन क्षमता और उच्च तापमान (46°सें.तक) सहन करने की क्षमता रखती है.
वर्मी कल्चर स्वदेशी तकनीक के बारे में मिलेगी जानकारी
यह तकनीक पशु वेस्ट और कृषि वेस्ट से अच्छी गुणवत्ता वाली जैविक खाद बनाती है, जो किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण को भी स्वस्थ रखती है. यह तकनीक 14 से अधिक राज्यों में किसानों और उद्यमियों को ट्रांसफर की गई है.
डा. एके पाण्डे ने कहा कि हमारे संस्थान द्वारा जैविक कचरा और गोबर से केचुआ जैविक खाद जय गोपाल वर्मी कल्चर स्वदेशी तकनीक का निमार्ण किया है.
इसके बारे में डिटेल में जानकारी दी जायेगी साथ ही साथ प्रेक्टिकल प्रदर्शन भी दिखाया जायेगा. ताकि जैविक खाद बनाने का तरीका सभी सीख सकें.
इस अवसर पर कोर्स निदेशक डॉ. हरि ओम पाण्डेय ने कहा कि इस दुनिया में कुछ भी बेकार नहीं है. उदाहरण के लिए हम सांस छोड़ते हैं, कार्बन डाइआक्साइड, जिसे हम बेकार मानते हैं.
कहा कि यह पौधों की जीवन रेखा बन रही है. हम पशुधन पर काम कर रहे हैं, पशुधन को जैव-शोधक माना जाता है.
उन्होंने कहा कि हम कृषि वेस्ट और उप उत्पादों को मूल्यवान और मानव उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित कर रहे हैं.
इस दो दिवसीय प्रशिक्षण में हम वर्मी कम्पोस्ट से सम्बन्धित वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पूरी जानकारी लोगों को देंगे.












