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Goat Farming: तालाब और नदी से पानी पीने पर बकरियों को हो जाती है ये बीमारी, पढ़ें इसके नुकसान

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शेड में किया जा रहा बकरी पालन. live stock animal news

नई दिल्ली. बकरियों में भी शरीर के अंदर के परजीवी यानि कीड़े रहते हैं. इनकी रोकथाम करना जरूरी होता है. रोकथाम के तहत बाड़े और चरागाहों की सफाई व कीटाणु को खत्म करने वाली दवाओं को देना जरूरी है. भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (IVRI) के एक्सपर्ट ने लाइव स्टॉक एनिमल न्यूज (Livestock Animal News) को जानकारी देते हुए कहा कि कम से कम तीन बार परजीवी यानि कीड़े की दवाएं पशुओं जरूरी देनी चाहिए. हर बार दवा का रसायन अलग होना चाहिए. ऐसा करने से सही तरह से दवा का असर होगा.

बकरियों को कई तरह आंतरिक कीड़े परेशान करते हैं. उन्हीं में से दो के बारे में हम यहां आपको जानकारी देने जा रहे हैं.

पसलियों का संक्रमण क्या है
जिन क्षेत्र में तालाबों की संख्या ज्यादा होती है वहां पर शंख जैसे कीड़े भी ज्यादा होते हैं. इन स्नेल के शरीर में लिवर फ्लूक की कुछ अवस्थायें बढ़ती हैं और तालाब के निकट के चराई वाली घास को दूषित करती है.

इस दूषित घास को खाने से बकरी में यह रोग उत्पन्न होता है. ज्यादा संख्या में कीड़े शरीर में पहुंचने पर पशु की पसलियां इन कीड़ों से भर जाती हैं.

पसलियां की कार्य शक्ति कम होती है. पशु में पतले बदबूदार तेज दस्त होते हैं तथा पशु दिन प्रतिदिन कमजोर होता जाता है.

वहीं इससे उत्पादन कम हो जाता है. इस बीमारी में बकरियों की अचानक मौत भी हो जाती है. उपचार के तहत आक्सीक्लोजेनाइड की गोली एक ग्राम प्रति 100 किलो शारीरिक भार की दर से दी जाती है.

इसे ​देने के लिए निलजान लिक्विड 1 मिली प्रति 3 किलो शारीरिक भार की दर से पिलाना चाहिए.

ट्राईक्लेवेन्डाजोल 10 मिग्रा प्रति किलो ग्राम वजन काफी प्रभावशाली दवा है और हर 6-6 माह पर जांच करते हुए उपचार करें. लीवर सुधार के लिये लीवर टानिक दे सकते हैं.

ठहरे हुऐ पानी, तालाबों पोखर से बकरी को पानी नहीं पिलाना चाहिये. क्यों ये वहां से पानी पीने से ज्यादा होती है.

Written by
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