नई दिल्ली. पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन महाविद्यालय मथुरा के पोल्ट्री विज्ञान विभाग के प्रो. डॉ. पीके शुक्ला का कहना है कि पोल्ट्री उद्योग घर के अहाते या पीछे के हिस्से में शुरू होने वाले एक छोटे से व्यवसाय से विकसित होकर, भारत के सबसे संगठित और तकनीकी रूप से उन्नत पशुधन क्षेत्रों में से एक बन गया है. पिछले पांच दशकों में, इस उद्योग ने लगातार अपनी मजबूती साबित की है. इसने हर साल ऐसी विकास दर हासिल की है, जो कई अन्य कृषि व्यवसायों की तुलना में कहीं अधिक है. आज, पोल्ट्री उद्योग अंडे और चिकन के रूप में सस्ता और उच्च गुणवत्ता वाला पशु प्रोटीन उपलब्ध कराकर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में बड़ा योगदान दे रहा है.
कहा कि साथ ही, यह उत्पादन, चारा निर्माण, हैचरी, प्रोसेसिंग, लॉजिस्टिक्स, रिटेलिंग और इससे जुड़े अन्य क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी पैदा कर रहा है. भारत दुनिया में अंडे और ब्रॉयलर मीट (मुर्गे के मांस) के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है। यहाँ पोल्ट्री पक्षियों की संख्या एक अरब से अधिक है और सालाना 149 अरब से ज्यादा अंडों का उत्पादन होता है.
पोषण सुधार में अहम है पोल्ट्री सेक्टर की भूमिका
उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र कृषि के ‘ग्रॉस वैल्यू एडेड’ (GVA) में महत्वपूर्ण योगदान देता है, लाखों लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आजीविका प्रदान करता है.
साथ ही पोषण स्तर को सुधारने में अहम भूमिका निभाता है, खासकर बच्चों, महिलाओं और समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए.
तेजी से हो रहे शहरीकरण, लोगों की बढ़ती आय, खान-पान की बदलती आदतों, प्रोटीन पोषण के प्रति बढ़ती जागरूकता के चलते भी ये सेक्टर बढ़ रहा है.
संगठित रिटेल के विस्तार और ‘क्विक-सर्विस’ रेस्तरां (जैसे फास्ट फूड चेन) के बढ़ने से पोल्ट्री उत्पादों की घरेलू मांग में काफी तेजी आई है.
हालांकि, पिछले कुछ दशकों में हुई इस शानदार प्रगति के सामने अब उत्पादन लागत में भारी बढ़ोतरी की चुनौती खड़ी हो गई है.
मक्का, सोयाबीन मील, खाद्य तेल, विटामिन, खनिज, टीके, दवाइयाँ, ईंधन, बिजली, परिवहन, श्रम और पैकेजिंग सामग्री की कीमतें बढ़ने से पोल्ट्री उद्योग की पूरी चेन में मुनाफे का मार्जिन काफी कम हो गया है.
कुल उत्पादन लागत का लगभग दो-तिहाई हिस्सा चारे की कीमत का होता है. इसमें काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, जिसके कई कारण हैं.
जैसे जलवायु परिवर्तन, बर्ड फ्लू (एवियन इन्फ्लूएंजा) का बार-बार फैलना, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (दवाओं का बेअसर होना), अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों में बदलाव, सप्लाई चेन में रुकावटें और बदलती व्यापार नीतियां.
आर्थिक दबावों के अलावा, पोल्ट्री उत्पादकों को कई अन्य चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है.
इनमें जलवायु परिवर्तन, बर्ड फ्लू का बार-बार आना, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस, खाद्य सुरक्षा और पशु कल्याण को लेकर उपभोक्ताओं की बढ़ती उम्मीदें.
इसके अलाा पर्यावरण संबंधी नियम, और पूरी सप्लाई चेन में उत्पादों की ‘ट्रेसेबिलिटी’ (यानी यह पता लगाने की क्षमता कि उत्पाद कहां से आया है) की जरूरत शामिल है.
छोटे और मध्यम स्तर के पोल्ट्री किसान विशेष रूप से अधिक जोखिम में हैं, क्योंकि उनके पास मोलभाव करने की सीमित क्षमता है.
तकनीक तक पहुंच कम है, वित्तीय मजबूती कम है और बाजार की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव होता रहता है.












Leave a comment